कहावतों का जाति विमर्श

                                                       डा. सत्य प्रिय पाण्डेय , लोक साहित्य विमर्शकार 
                                                                                   एवं असिस्टेंट प्रोफेसर

                                                             श्यामलाल कॉलेज , दिल्ली विश्वविद्यालय | 
     मोबाइल नंबर –  8750483224 ईमेल -  pandeysatyapriya@gmail.com

संसार की शायद ही ऐसी कोई जाति रही हो जिस पर कहावतें न बनीं हों | जहां जाति भेद नहीं रहा वहाँ नस्ल भेद रहा है, रंग भेद रहा है , भेद किसी न किसी रूप में अवश्य रहा है | इसलिए भारत ही नहीं विश्व के अन्य देशों में भी जाति और नस्ल पर कहावतें मिलती हैं | यह इस बात का प्रमाण है कि हर जाति अथवा नस्ल की कोई न कोई ऐसी विशिष्टता जरूर होती है जो उसे अन्य जाति से अलग एक विशिष्ट पहचान दिलाती है इसे कोई उसका दोष भले कहे किन्तु इनका बड़ा ही सूक्ष्म विश्लेषण कहावतों में प्राप्त होता है | एक फ्रांसीसी कहावत देखें जिसमें यहूदी , ग्रीक और अर्मेनियन के बारे में कहा गया है कि – यहूदी और साँप हों तो साँप पर विश्वास करो , यहूदी और ग्रीक में ग्रीक पर किन्तु अर्मेनियन पर कभी विश्वास नहीं किया जा सकता | यहूदियों के बारे में सभी देशों की कहावतों की राय लगभग एक ही तरह की है कि ये विश्वास के योग्य नहीं होते हैं | मसलन यहूदियों पर ही और कहावतें देखें – यहूदी ही यहूदी को धोखा दे सकता है 2| व्यापार यहूदी को नष्ट कर देता है और यहूदी व्यापार को 3|  एक लिवोलियन कहावत देखेंजिसमें यहूदी को सबसे ज्यादा ख़तरनाक बताया गया है – पोल जर्मन के द्वारा ठगा गया है , जर्मन इटैलियन के द्वारा , इटैलियन स्पैनियन के द्वारा , और स्पैनियन यहूदियों के द्वारा और यहूदी शैतान के द्वारा | 4 संभव है कि यहूदियों ने अपनी कुटिलता से लोगों को ठगा हो और अपना विश्वास खोया हो | कहावतें यह बताती हैं कि यहूदी बहुत ही चलाक और कुटिल स्वभाव के होते हैं | कुछ अन्य देशों की कहावतें देखें मसलन स्लाविक के बारे में एक कहावत देखें – यदि आपने स्लाविक को घर में शरण दी तो वह आपको ही घर से ही बेघर कर देगा | एक रूसी कहावत के अनुसार – ग्रीक्स साल में केवलएक बार ही सच बोलता है (The Greeks only tell the truth once a year .) इस तरह से एक देश के लोग दूसरे देश के लोगों के बारे में कैसी राय रखते हैं , यह कहावतों में देखा जा सकता है | और यह धारणा अकारण नहीं है बल्कि जिस देश ने दूसरे देश पर शासन किया तो उस साम्राज्यवादी देश के प्रति पराधीन देश के लोगों का भाव इन कहावतों में अभिव्यक्त हुआ है | उन्होंने बहुत नजदीक से देखा , परखा और तब जाकर यह बातें कहीं हैं , ये निष्कर्ष अनुभव प्रसूत हैं न कि सुनी सुनाई बातों पर आधारित हैं  | वैसे तो सभी मनुष्य ही हैं किन्तु हर जाति का स्वभाव , उसकी आचरण पद्धति अलग अलग विशिष्टताओं से युक्त है, यह अपने आप में समाजशास्त्र और मनोविज्ञान से जुड़ा हुआ विषय है | दरअसल यह जातिगत स्वभाव एक  दिन में नहीं बना होगा बल्कि यह एक लम्बी सामाजिक यात्रा की परिणति कहा जा सकता है | यहाँ हम भारत की कुछ प्रमुख जातियों से सम्बंधित कहावतों का विमर्श करेंगे | भारतीय समाज जाति प्रधान समाज रहा है | परस्पर जातियों में भेदभाव , उनमें खींच तान और वैमनष्य भारतीय समाज  की विशेषता रही है | इस वैमनष्य और विरोध के सामाजिक और आर्थिक कारण रहे हैं जिनसे इन जातियों का ऐसा स्वभाव बना | यों भी किसी जाति की स्वभाव निर्मिति में उसके व्यवसाय की प्रकृति और उसके प्रति समाज के दृष्टिकोण की भूमिका ही निर्णायक होती है मसलन कायस्थजाति कोही देखें तो इन पर बहुत सी कहावतें बनी हैं |  भारतीय समाज में कायस्थ को बड़ा ही चालाक और कुटिल माना जाता है | ये प्रायः पटवारी का काम करते थे | फ़ारसी में दक्ष होते थे | अंग्रेजी राज में कायस्थ ही पटवारी का कार्य करते थे |  ये हिसाब किताब में बड़े ही तेज होते थे और अपनी कलम का खाते थे | जमीन का रकबा घटाने बढ़ाने की कला में ये निपुण होते थे और इसी का फायदा उठाकर ये किसानों से रुपया पैसा भी वसूलते थे | इनके स्वभाव को उद्घाटित करती हुई यह कहावत देखें –

कृष्णदत्त पालीवाल के आलोचना-वृत्त में निर्मल वर्मा



राम प्रकाश द्विवेदी

ई-मेल: ram@globalculturz.org

आलोचक अौर रचनाकार का अनूठा रिश्ता होता है। वे एक दूसरे के पूरक होते हैं अौर दोनों के बीच एक सरोकारी संतुलन भी होता है। जब यह संतुलन गड़बड़ाने लगता है तो आलोचक में पूर्वग्रह सक्रिय हो चलता है अौर रचनाकार का वास्तविक मूल्यांकन बाधित होता है। आलोचक के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती उन कसौटियों को तैयार करना है, जिनसे उस विशिष्ट रचनाकार की भावभूमि का उद्घाटन हो सके। आलोचक को एक दूरस्थ-आत्मीयता अालोच्य लेखक से बनानी पड़ती है। अालोचक की जवाबदेही दोहरी है-रचनाकार अौर पाठक दोनों के प्रति। बहुधा देखने में आता है कि पाठक विभिन्न, विरोधी से दिखने वाले भी, लेखकों से सहजता से तादात्म्य स्थापित कर लेता है लेकिन आलोचक अपने मानकों के चलते यदा-कदा कृतियों के साथ न्याय कर पाने में सक्षम नहीं होता। ऐसा कर पाने में वही आलोचक सक्षम होता है जिसकी आलोचना की कसौटियाँ अपनी लोच बनाएँ रखने में सक्षम होती हैं अौर जिसमें उदारता का बोध सक्रिय रहता है।