उत्तर-उत्तरआधुनिकतावाद: सांस्कृतिक परिदृश्य, तकनीकी एवं जनसंचारिकी

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GLOBALCULTURZ  Vol.III No.2 May-August 2022 ISSN:2582-6808 

Article ID-2022-3-2-002 Pages: 508-520 Language: Hindi 

                            Date of Receipt: 2022.03.26 Date of Review: 2022.05.27 Date of Pub: 2022.06.01

                          Domain of Study: Humanities & Social Sciences Sub-Domain:  Post-postmodernism 

DOI: 10.13140/RG.2.2.23250.63681 


प्रो० राम प्रकाश द्विवेदी

भीमराव अम्बेडकर महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली, भारत

 E-mail:ram.dwivedi@bramb.du.ac.in [M:+91-9868068787

 About the Author                                                      

Prof. Ram Prakash Dwivedi is associated with Dr. Bhimrao Ambedkar College, University of Delhi, India. He has been to Tokyo University of Foreign Studies, Tokyo, Japan, as a Visiting Professor. His key areas of research are post-postmodernism, cinema, and communication studies, as well as the language and literature of Hindi. He has been awarded fellowships and also writes short-stories and poems. There are several books and research papers to his credit.                                                       

Note in English

Digital technologies have become a dominant tool in shaping the contemporary cultural and public sphere. Alan Kirby and a few other thinkers began to draw the attention of academics towards this changing phenomenon in the year 2007. The researcher finds that these technologies have posed a potential threat to the very existence of human beings; their creativity, intellect, and emotional relationships. Artificial intelligence, algorithms, filter bublling, robotics, metaverse, and other related techniques are continuously challenging the privacy, understanding, and behaviour of individuals and social order in everyday life. The role of languages and literature in society is weakening and "truth" is being replaced by "post-truth" through the vast use of communication media, cryptocurrencies and dark web. 

शोध सार

उत्तर-उत्तरआधुनिकतावाद मनुष्य के विवेक, चिंतनशीलता, स्वातंत्र्य, सत्य एवं सृजनात्मकता पर तकनीक और उसके नियंत्रकों के आधिपत्य को स्थापित करने वाली ऐसी स्थिति है जो कृत्रिम मेधा, यंत्र-शिक्षण और फिल्टर बबल जैसी संचार प्रणालियों का सशक्त उपयोग कर उसके वास्तविक अस्तित्व को निगलने का प्रयास कर रही है। सॉफ्ट पॉवर, उत्तर-सत्य कथनों, मिथ्या चुनौतियों, छद्म आत्मतोष की पद्धतियों को प्रसारित एवं लोकप्रिय बनाकर भ्रामक समाजिक सशक्तिकरण और मानव ऊर्जा के अनुपयोगी प्रयोगों को बढ़ावा दिया जा रहा है। क्या उत्तर-उत्तरआधुनिकतावाद के कृत्रिम जाल से बुनी सृष्टि की सूचना, संस्कृति, तकनीक से चौतरफा घिरा मनुष्य अपने वास्तविक विवेक, आनंद एवं जीवन-शैली का पुनराविष्कार कर पाने में सक्षम हो सकेगा? या फिर, यह छद्मवादिता ही उसकी नियति बनेगा? यह परिस्थितियाँ कैसे बनीं और इनके बीच मनुष्य का भविष्य क्या होने वाला है; इसका अन्वेषण इस शोध-आलेख में करने का प्रयास किया गया है। वैज्ञानिक विकासवाद से उपजे संकटों और मिथ्या अवधारणाओं के पुनर्मूल्यांकन का प्रयास भी इस आलेख में हुआ है। 


कूटशब्द-उत्तर-उत्तरआधुनिकतावाद, संस्कृति, तकनीक, जनसंचार

सामाजिक असमानता तथा वृन्दावन लाल वर्मा का उपन्यास साहित्य

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GLOBALCULTURZ  Vol.III No.2 May-August 2022 ISSN:2582-6808 

Article ID-2022-3-2-001 Pages: 501-507 Language: Hindi 

                                 Date of Receipt: 2022.05.10 Date of Review: 2022.05.25 Date of Pub: 2022.05.31

Domain of Study: Humanities & Social Sciences Sub-Domain: Literary Studies 

डॉ. महेश पाल सिंह

भीमराव अम्बेडकर महाविद्यालय

 दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली, भारत

E-mail:maheshpalsingh001@gmail.com [M:+91-9968720378]


 About the Author                                                      


 भीमराव अम्बेडकर महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय में कार्यरत                                                      


शोध सारांश

हिन्दी साहित्य में प्रेमचन्द और उसके बाद तथा उनके साथ आने वाले साहित्यकारों ने उपर्युक्त दोनों विचार घटनाओं का मंथन विश्लेषण किया है, वृन्दावन लाल वर्मा का कथा साहित्य हमारे सामने जिस परिदृश्य को प्रस्तुत करता है वह विचार की इन्हीं धाराओं से प्रचालित हुआ है। भारत की सामाजिक स्थिति कई दृष्टियों से एक अपनी निजी ऐतिहासिक परिस्थितियों से प्रभावित होकर निर्मित हुई है जिसमें जातीयता का विशेष स्थान रहा है, यह जातीय दृष्टिकोण सदा ही एक-सा प्रभावी रहा हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता लेकिन इसका परावर्तन साहित्य में सदैव परिलक्षित हुआ है - भारत वर्ष में दीर्घकाल तक वर्ण व्यवस्था और संयुक्त परिवार समाज संगठन के आधार के मुख्य सतम्भ थे। ये दोनों तत्व आज भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में सामाजिक जीवन को प्रभावित कर रहे हैं। 

कूट शब्द- हिंदी उपन्यास, समाज, साहित्य, असमानता 

Ghalib and His Literature: A Source of Dilli’s History

 GLOBALCULTURZ ISSN:2582-6808 Vol.II No.1 January-April 2021  

Article-ID 202101228  Pages270-275 Language:Hindi Domain of Study: Humanities & Social Sciences  Sub-DomainHistory Title: Ghalib and His Literature: A Source of Dilli’s History


Manish Karmwar Assistant Professor, SLCe College, University of Delhi (India)

[E-mailmanishkarmwar@gmail.com [[M:+91-9818014416] 

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Note in English 

History of Delhi and Ghalib

I ASKED MY SOUL: WHAT IS DELHI?

SHE REPLIED: THE WORLD IS BODY AND DELHI ITS LIFE. 

Abstract Mirza Ghalib is Delhi’s true metaphor. He loved the city very much was a quintessential witness of a transition occurring in British Delhi. His life was greatly affected by this transition. Ghalib’s writings, reactions, letters and analysis; though they were for different motive but they shaped a true source of history of Delhi. This paper has tried to examine Ghalib’s life was a witness to the changes happening in 19th century in Delhi. He began writing letters in Urdu around 1847. He quit the old-fashioned way of writing letters that essentially meant long salutations and tortuous language and instead went for a very lively and frank style. This paper has discussed the contributions of Mirza Ghalib as Delhi’s metaphor and also review the Literature of Ghalib as a source of Delhi’s history Pre- and Post-1857. Ghalib lived in the city of Delhi, saw with his own eyes madness and mayhem descend upon the streets of his beloved city and witnessed the siege and slaughter of an entire way of life. This work also elaborates the contradictions of the society of Delhi reflected in the life and work of Ghalib..


Keywords Delhi, Mirza Ghalib, British India,1857, Urdu letters.

GHALIB AND HIS EARLY DAYS

Ghalib was born in Agra on 27 December 1797. His links with Agra were however not ancestral. His grandfather, Quqan Beg Khan, Ghalib claimed had come to India from Samarqand. Khan was a military adventurer employed at different times with the Governor of Punjab, the Mughal Abdullah Beg Khan and Nasrullah Beg Khan, followed in their father’s footsteps. It was both an uncertain and a dangerous profession. We have seen, Ghalib was hardly four when his father died. After his death, Nasrullah Beg took his brother’s family in his care, consisting of Ghalib, his younger brother and sister.

मॉरीशस के स्वतंत्रता आंदोलन में हिन्दी पत्रकारिता का अवदान

  GLOBALCULTURZ ISSN:2582-6808 Vol.II No.1 January-April 2021  

Article-ID 202101228  Pages276-279 Language:Hindi Domain of Study: Humanities & Social Sciences  Sub-DomainMedia Studies Title: मॉरीशस के स्वतंत्रता आंदोलन में हिन्दी पत्रकारिता का अवदान


पंकजेंद्र किशोर असिसटेंट प्रोफेसर, सहायक प्राध्यापक,जाकिर हुसैन दिल्ली महाविद्यालय (सांध्य), दिल्ली विश्वविद्यालय, नई दिल्ली (भारत)

[E-mailpankajendrakishore@gmail.com [[M:+91-7042116828] 

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Note in English 

Media Studies

आलेख सार भारत की तरह मॉरीशस में भी हिन्दी पत्रकारिता का उदय और विकास आजादी की कामना से संभव हुआ। वहाँ पर भी पत्रकारिता के कारण सामाजिक-सांस्कृतिक जागरण संभव हो पाया। पत्रकारिता ने अंग्रेजों के कुकृत्य का पर्दाफाश करते हुए वहाँ के लोगों को जागृत करने का बड़ा काम किया। बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशक के पत्रकारों की इस दिशा में ऐतिहासिक भूमिका रही। इसी दौरान मॉरीशस में मगनलाल मणिलाल डॉक्टर द्वाराहिन्दुस्तानीकी शुरुआत हुई। इसके द्वारा हिन्दी पत्रकारिता का शंखनाद हुआ।.


बीजशब्द मॉरीशस, स्वतंत्रता आंदोलन, हिन्दी पत्रकारिता

 किसी के भी बंधन में रहना, किसी को भी बंधन में रखना परतंत्रता है।"[1] सोलहवीं सदी से पूर्व यूरोपीय देशों को भीपोपसे मुक्ति के लिए संघर्ष करना पड़ा था और इसी मुक्ति की कामना के परिणामतः इटली में रिनेसां आया। यह पुनर्जागरण ज्ञान-विज्ञान के कारण ही संभव हो पाया। भारत में भी इस्लाम की प्रतिक्रिया, सामाजिक-धार्मिक चेतना के उदय और औद्योगिक क्रांति के कारण नवजागरण संभव हो पाया।

जापान: भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ का अनुभवजन्य अनुशीलन

 

GLOBALCULTURZ  Vol.II No.1 January-April 2021 ISSN:2582-6808 

Article ID-202101029 Pages: 276-281 Language: Hindi 

Domain of Study: Humanities & Social Sciences Sub-Domain: Literary Studies 

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राम प्रकाश द्विवेदी

एसोसिएट प्रोफेसरभीमराव अंबेडकर कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली (भारत)

E-mail: rampdwivedi@gmail.com [M:+91-9868068787]

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 About the Author                                                      

 Associate Professor, Deptartment of Hindi. Dr. Bhim Rao Ambedkar College, University of Delhi

Delhi [INDIA]

                                                                                                                   

Note in English 

Literary Studies

          


                                                                                                  

शोध सार- तोक्यो विदेशी अध्ययन विश्वविद्यालय जापान में हिंदी शिक्षण का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संस्थान है। विश्व हिंदी शिक्षण केंद्रों में इसका बड़ा आदर है।  मौलाना बरकतउल्ला भोपाली विदेशों में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ क्रांतिकारी काम में जुटे हुए थे। 1910 ई० में वे इसी सिलसिले में तोक्यो पहुँचे और विदेशी अध्ययन विश्वविद्यालय में अनौपचारिक रूप से हिंदुस्तानी-उर्दू और हिंदी-के अध्यापन का कार्य करने लगे। आज यहाँ 27 विदेशी भाषाओं का अध्यापन किया जाता है जिनमें तीन-हिंदी, उर्दू, बंगाली-भारत की ही हैं। हालाँकि कूटनीतिक कारणों से उर्दू के प्राध्यापक पाकिस्तान से आते है। हिंदी और बंगाली के भारत से। अब बंग्लादेश के लोग अपने यहाँ से अध्यापक बुलाने की माँग कर रहे हैं। आजादी के बाद हिंदी और उर्दू के स्वतंत्र विभाग विकसित हो गए थे।