कृष्णदत्त पालीवाल के आलोचना-वृत्त में निर्मल वर्मा

प्रो० कृष्णदत्त पालीवाल 
सौजन्य: नई दुनिया
आलोचक अौर रचनाकार का अनूठा रिश्ता होता है। वे एक दूसरे के पूरक होते हैं अौर दोनों के बीच एक सरोकारी संतुलन भी होता है। जब यह संतुलन गड़बड़ाने लगता है तो आलोचक में पूर्वग्रह सक्रिय हो चलता है अौर रचनाकार का वास्तविक मूल्यांकन बाधित होता है। आलोचक के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती उन कसौटियों को तैयार करना है, जिनसे उस विशिष्ट रचनाकार की भावभूमि का उद्घाटन हो सके। आलोचक को एक दूरस्थ-आत्मीयता अालोच्य लेखक से बनानी पड़ती है। अालोचक की जवाबदेही दोहरी है-रचनाकार अौर पाठक दोनों के प्रति। बहुधा देखने में आता है कि पाठक विभिन्न, विरोधी से दिखने वाले भी, लेखकों से सहजता से तादात्म्य स्थापित कर लेता है लेकिन आलोचक अपने मानकों के चलते यदा-कदा कृतियों के साथ न्याय कर पाने में सक्षम नहीं होता। ऐसा कर पाने में वही आलोचक सक्षम होता है जिसकी आलोचना की कसौटियाँ अपनी लोच बनाएँ रखने में सक्षम होती हैं अौर जिसमें उदारता का बोध सक्रिय रहता है। कृष्णदत्त पालीवाल एक अध्यापक-आलोचक हैं। विशुद्ध आलोचक नहीं। विशुद्ध आलोचक के पास यह छूट होती है कि वह अपने मानकों अौर कसौटियों को गढ़े अौर उन पर रचना का मूल्यांकन करे। यानी उसे अपने आलोचना-वृत्त के निर्माण की पूरी छूट होती है अौर वह बँधे-बँधाए ढाँचे के आधार पर अपने निष्कर्ष प्रस्तावित करने के लिए स्वतंत्र हो सकता है। अध्यापक-आलोचक को रोजमर्रा के जीवन में अपने विद्यार्थियों से संवाद करना पड़ता है अौर उनके उठाए प्रश्नों का हल खोजना होता है। संवाद की इस प्रक्रिया से अध्यापक-आलोचक अपनी कसौटियों अौर मानकों को निरंतर गतिशील बनाए रखने को विवश होता है जबकि विशुद्ध आलोचक अपनी बनाई दुनिया के अालोक में रचना को समझने को स्वतंत्र है। 8 फरवरी, 2018 को आयोजित ‘कृष्णदत्त पालीवाल स्मृति व्याख्यान’ में प्रो० विजय बहादुर सिंह ने बीज वक्तव्य देते हुए उलाहना की शैली में कहा कि ‘पालीवाल जी की आलोचना में अतिव्यापकता अौर अध्यापकीय प्रभाव’ है [1]। निश्चय ही वे इसे नकारात्मक संदर्भों में रेखांकित कर रहे थे। मैं, अतिव्यापकता अौर अध्यापकीय प्रभाव दोनों को आलोचना के सकारात्मक बिंदु के रूप में प्रस्तावित करना चाहता हूँ। इससे आलोचक की गतिशीलता का पता चलता है अौर उसके पास अपने छात्रों से संवाद का जो अवसर है, जिससे विशुद्ध अलोचक वंचित है, उसका रचनात्मक उपयोग करने की उत्कंठा है। कृष्णदत्त पालीवाल को इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो, वे भक्तिकाल से लेकर उत्तर-आधुनिकतावाद तक की रचनाशीलता पर विचार करते हुए अपने आलोचना-वृत्त का निर्माण करते हैं। उनका यह आलोचना-वृत्त सामाजिक इतिहास, द्वंद्ववादी भौतिकवाद के द्वंद्व, मनोविश्लेषण, भारतीय अौर पश्चिमी काव्यशास्त्र की स्थापनाअों, कविता अौर गद्य की अधुनातन कसौटियों, भाषा-वैज्ञानिक विन्यासों, नारी अौर दलित विमर्श की प्रतिज्ञाअों अौर चिह्न-शास्त्रीय उठा-पठक से निर्मित हुआ है। इस आलोचना-वृत्त में वाल्मीकि, व्यास, पाणिनि, भरत, मम्मट, विश्वनाथ, अानंदवर्धन, प्लेटो, अरस्तू, लोंजाइनस, कॉलरिज, टी०एस० एलियट, रोलां बार्थ्स, हिपोलिट टेन आदि के स्वर गूँजते हैं। इसमें बुद्ध, गाँधी, मार्क्स, अंबेडकर, जेपी, लोहिया का भास्वर नाद भी सुनाई देता है। अपनी साहित्यिक परंपरा का संदर्भ अौर स्वर तो मुखर है ही। इन संवेत स्वरों की सामानांतर ध्वनियाँ विशुद्ध आलोचक को ‘क्न्फ्यूज़न’ की प्रतीति करवाती हैं, क्योंकि इससे आलोचकीय मठ ध्वस्त होते हैं अौर गिरोहजीवी आलोचना की बेल मुरझा जाती है। पालीवाल जी का आलोचना-वृत्त पाठ अौर परंपरा की रेखाअों से उभरता है जिसमें रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, विजय देव नारायण साही अौर राम विलास शर्मा के मानकों का पुनर्अन्वेषण है। फलत: वे उदारवादी समालोचकों के बीच समादृत होते हैं अौर अपने शिष्य-मंडल की लोकप्रियता अर्जित करते हैं, लेकिन बहुतेरे आलोचना-समूह आलोचक के रूप में उनकी मान्यता रद्द करने का उपक्रम करते रहते हैं। हिंदी की आलोचना परंपरा में तीन प्रकार के आलोचक मिलते हैं-विशुद्ध, रचनाकार, प्राध्यापक। पालीवाल जी प्राध्यापक आलोचक थे। साहित्य मूल्यांकन की उनकी कसौटियाँ समाज के विभिन्न वर्गों से आए विद्यार्थियों के अंतरसंवाद से भी निर्मित-विकसित होती रहीं। प्राध्यापक आलोचक को अपनी कसौटियों की परीक्षा के लिए ‘क्लासरूम’ जैसा जीवंत बैटलग्राउंड भी उपलब्ध होता है। मैं स्वयं इस बैटलग्राउंड का प्रत्यक्षदर्शी रहा हूँ। बात उन दिनों की है जब पिता जी जिद कर रहे थे कि मैं उनके व्यवसाय में शामिल हो उनकी सहायता करूँ।मुझे उनकी इस बात में कोई दिलचस्पी नहीं होती थी। कोई सामान बेचना मेरे लिए बेहद चुनौतीहीन लगता था। इसलिए मैं उनकी बात टालता रहता था। राहुल सांकृत्यायन की किताबें जहन में जोर मार रहीं थीं। दुनिया घूमने का सपना बार-बार आता था। इसलिए टूरिज्म का कोर्स करने पहुँच गया। 12 वीं कक्षा तक साइंस पढ़ने के बाद विज्ञान को छोड़कर कुछ अौर पढ़ना चाहता था। टूरिज्म में दाखिले के समय मेरा चरित्र प्रमाण-पत्र स्कूल में ही रह गया था। जब अपने स्कूल पहुँचा तो वापस जाने के लिए समय बहुत कम बचा था। इसलिए हिन्दू कॉलेज में हिन्दी में ही दाखिले के लिए चला गया। बाद में टूरिज्म कोर्स में माइग्रेशन की अपेक्षा के साथ। 1990 में पालीवाल सर ही इंचार्ज थे। पहुँचा तो थोड़ा डरा हुआ था। यदि आज दाखिला नहीं हुआ तो सब अटक जाएगा। उन्होंने ने मेरे कागजात चेक किए। फिर पूछा कोई कविता या डिबेट करते हो। मैंने कहा-जी सर! वे तपाक से बोले -कविता सुनाअो बेटा। मैंने दसवीं कक्षा में एक कविता लिखी थी-स्वर्ण जड़ित रथ में चढ़कर, जब सूरज नभ में आता है।मुखरित मानव मन होता है, पुष्प पेड़ लहराता है।इस कविता के कुछ अंश सुनाए। उन्होंने फॉर्म दिया अौर मेरा दाखिला हो गया। बाद में मान्धाता अोझा, हरीश नवल, सुरेश ऋतुपर्ण, विजया सती, दीपक सिन्हा अौर रामेश्वर राय जैसे सभी अध्यापकों के प्रभाव ने हिन्दी ही पढ़ते रहने की प्रेरणा का सृजन कर दिया था, इसलिए टूरिज्म की बात पीछे रह गयी थी। जैसाकि सभी जानते हैं कि पालीवाल जी की स्मृति अत्यंत समृद्ध थी, इसलिए वे कक्षाअों में लगातार आकर्षित करते थे। अोजस्विता उनका दूसरा पहलू है। बहुत ऊर्जा के साथ उनका कक्षाअों में प्रवेश होता था अौर वे विषय के व्यापक आयाम खोल देते थे। उनके अध्यापन को ही देखकर लगता था कि हिन्दी एक ताकतवर भाषा है। दूसरे वर्ष में पता चला कि वे विश्वविद्यालय में चले गए है। इसलिए मिलना कम हो गया था। कभी-कभी अभय ठाकुर के साथ मिलने का मौका मिलता था।बाद में जब एम०ए० करने गया फिर उनके संपर्क में आया। उन दिनों कक्षाअों में नित्यानंद जी, पालीवाल जी अौर त्रिपाठी जी सबसे आकर्षित करते थे।पालीवाल जी में प्रवाह बहुत होता था। बहुत से मित्र इसकी अालोचना करते थे। शायद दुनिया का न सही पर भारत का सबसे बड़ा सच ‘ईर्ष्या अौर निंदा’ है। विश्वविद्यालय के दूसरे किसी अध्यापक में यह ताकत नहीं थी कि वह इतनी ऊर्जा से क्लास को चला सके। इसलिए वे निंदा का विषय बनते रहे। आपकी क्षमताएँ ही जब निंदा का विषय बनने लगें तो यह आपकी सफलता ही मानी जाएगी। आम छात्र तो सच को पहचनता है। इसलिए पालीवाल जी उनके बीच लोकप्रिय बने रहे। वे संकुचित विचारपंथी नहीं थे। बहुत तरह के विचारों का वे समभाव से आदर करते थे अौर हमें भी उसी तरह से सोचने-समझने की प्रेरणा देते थे। आज जब विचारधाराअों के महल खण्डहरों में तब्दील हो गए हैं तो उनकी स्मृति बड़े उज्ज्वल रूप में उभरती है। हाँ, वे गाँधी, आंबेडकर अौर लोहिया के सबसे करीब दिखाई देते थे पर मार्क्स की भी कभी भोड़ी व अतार्किक आलोचना की हो एेसा मुझे ध्यान नहीं आता। वे मार्क्स की तो नहीं पर अपने ईर्द-गिर्द जमा मार्क्सवादियों की खबर लेने में चूक नहीं करते थे अौर उनके अच्छे मित्रों में भी मार्क्सवादी ही थे।माथे पर धँसी हुई दो छोटी-छोटी अाँखों में कितनी शक्ति है कितना उजाला है यह तब जान पाया जब उनके साथ पीएच०डी० करने का मौका मिला। हिन्दू कॉलेज अौर विश्वविद्यालय में ज्यादातर मैं अगली सीट पर ही बैठता था। कभी-कभी पढ़ाते हुए वे कंधों को झकझोर देते थे। याद नहीं पड़ता उन्होंने कभी बैठकर पढ़ाया हो। एक दिन लंच करते हुए हम कक्षा में बेतरतीब बैठे हुए थे। वे ‘राम की शक्तिपूजा’ का मौखिक वाचन करते हुए प्रवेश कर रहे थे। सब चंद सेकेण्डों में ही व्यवस्थित हो गए। हिन्दू कॉलेज में पता नहीं था कि वे सिगरेट पीते हैं। एक दिन जब विश्वविद्यालय के उनके कमरे में गया तो क्लास के ठीक पहले वे मुट्ठी बंद कर सिगरेट का लंबा कश खींच रहे थे। आश्चर्य चकित था, उनके इस स्टाइल पर।बाद में मैं उनकी अनेक बातों की मिमिकरी करता था अौर मित्र कहते थे मैं बहुत अच्छी तरह करता हूँ।उनके अध्यापन का असर कक्षाअों के बाहर भी मेरे साथ चला अाया था। अौरों के साथ भी जरूर जाता रहा होगा। इसलिए मेरे मित्र मनीष रंजन भी हूबहू उनकी नकल उतार लेते थे। उनके समीक्षात्मक लेखन पर छात्रों का दबाव बराबर बना रहता था। अपने ‘हिंदी आलोचना के नए वैचारिक सरोकार’ वाले ग्रंथ कि भूमिका में वे लिखते हैं, ‘यह पुस्तक विद्वानों के लिए नहीं है अौर न अतिरिक्त ज्ञान-दंभ में निमग्न शास्त्र जड़ता का रोना रोने वालों के लिए है। हर देश अौर काल का पाठक शास्त्र की जड़ता का अतिक्रमण करके गतिशील जीवन-यथा का साक्षात्कार करता रहा है अौर अब तो ‘पाठकवादी आलोचना’ का जमाना है।रामचंद्र शुक्ल अौर अज्ञेय, रिचर्ड्स अौर नाथ्रोप फ्राई भी पाठकवादी आलोचना के अग्रदूत कहे जा सकते हैं। फिर हम भारतीयों में रस मीमांसा (भाष्य-विज्ञान) को सदैव आदर से आपनाया है।’ पालीवाल जी के संदर्भ में यह पाठक उनका विद्यार्थी था।पीएच०डी० के ही दिनों में उनके रोहिणी वाले अौर बाद में साकेत के घर में बराबर जाना होता रहा। पर ज्यादातर मुलाकातें लॉ फैकल्टी की चाय की दुकान पर होती थी। अनेक छात्र वहाँ आकर जम जाते थे अौर सहमतियों-असहमतियों के साथ हम अक्सर उनको बस अौर बाद में मेट्रो तक छोड़ने जाते थे। मेरे पीएच०डी० के ही दिनों वे तोक्यो विदेशी अध्ययन विश्वविद्यालय, जापान में थे। मुझे उनके लौटने का बेसब्री से इंतजार रहता। शोध की प्रगति अौर उसकी दिशा पर वे अक्सर अपनी मूल्यवान राय देते। यहाँ के किस्से-कहानियाँ भी वे सुनाते रहते।एक बार मैंने पूछा था कि-सर वहाँ कैसा लगता है आपको। उनका उत्तर था-सब मरि जाय अौर हम जाय। तब इंटरनेट का जमाना नहीं था। जापान जहाँ लोग अपने तक महदूद रहते हैं -उनके लिए जो हमेशा छात्रों-सहयोगियों के बीच घिरे रहते थे-एक मुश्किल मुकाम रहा होगा। बाद में जब मैं संयोग से वहाँ गया, तो इस बात को ज्याद अच्छी तरह समझ सकता हूँ। पहली बार उनसे ही ‘साके’ (जापानी शराब ) शब्द सुना था। हमारे अग्रज शंकर जी काफी उत्साहित हो जाते थे।बाद में उनसे मिलने का मौका संगोष्ठियों में ही मिलता था। लिखने-पढ़ने के लिए वे हमेशा प्रोत्सहित करते।पर हम सब अपनी मौज में बह रहे थे अौर आज भी वैसा ही है। हमारे सीनियर शंकर जी उनके सबसे करीबी थे। रमेश ऋषिकल्प को वे मित्रवत-शिष्य मानते थे। पर बेवजह अड्डेबाजी का समय उनके पास नहीं था। इसलिए हम सब अकेले-अकेले उनके साथ थे। या उन्हें अकेला कर रहे थे। भारतेन्दु, रामचंद्र शुक्ल, मैथिलीशरण गुप्त, अज्ञेय, रघुवीर सहाय, निर्मल वर्मा, विजयदेवनारायण साही को वे गहराई से याद करते थे। अपने समकालीनों में वे राम विलास शर्मा, रामस्वरूप चतुर्वेदी, केदारनाथ सिंह अौर अोम थानवी की चर्चा  बार-बार करते थे। (शायद मुझसे बहुत बातें छूट रही होंगी, आप जोड़ सकते हैं)। वे आदिकाल से लेकर समकालीन साहित्य तक किसी भी लेखक-रचनाकार को तर्कसंगत ढंग से पढ़ा सकते थे। परंपरा, आधुनिकता अौर उत्तर-आधुनिकता पर जब-जब उनसे बात हुई मेरा मानस कुछ समृद्ध ही होता चला गया था। उन्होंने पूरे देश में घूम-घूम कर व्याख्यान दिए हैं।प्रत्यक्ष शिष्य-समुदाय के अतिरिक्त परोक्ष शिष्यों का आदर-स्नेह उन्हें मिलता रहा है। भारत के जिस भी हिस्से में जाने का मौका मिला वहीं जब पालीवाल सर के अपने पीएच०डी० गाइड होने की बात बतायी तो आगे का परिचय देन की जरूरत न पड़ी। किसी शिष्य को गुरू एेसी शक्ति प्रदान कर दे तो उसका जीवन सार्थक हो जाता है। आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं, उनका दिया दर्प, गौरव अौर स्वाभिमान मेरे साथ खड़ा है। वही मेरी सबसे मूल्यवान पूँजी है। एक अटूट श्रृंखला है उनके साथ गुजारे समय की।इन कक्षाअों की जीवंत ऊर्जा लेकर वे अपने आलोचना-वृत्त की रेखाएँ खींचते रहे, उसको छोटा-बड़ा करते रहे। विद्यार्थियों की सचल प्रश्नवाही परंपरा ने उनको भक्तिकाल से लेकर उत्तर-आधुनिकतावाद की यात्रा करने पर विवश किया होगा। तो, पालीवाल जी के आलोचना-वृत्त के मूल बिंदु क्या हैं? उसमे किस प्रकार के परिवर्तन अौर परिवर्धन को लक्षित किया जा सकता है? अाइए उनकी आलोचनात्मक पुस्तकों के माध्यम से इसे समझने की कोशिश करते हैं।पालीवाल जी ने लगभग पैंतीस के करीब आलोचनात्मक ग्रंथों की रचना की जिसमें-राम नरेश त्रिपाठी, मैथिलीशरण गुप्त, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत, सर्वेश्वर, गिरिजाकुमार माथुर, भवानी प्रसाद मिश्र, माखनलाल चतुर्वेदी, अज्ञेय अौर रघुवीर सहाय जैसे कवियों की आलोचना शामिल है। उन्होंने अज्ञेय अौर निर्मल के गद्य पर भी विस्तार से लिखा है। इसके अतिरिक्त मध्ययुगीन हिंदी महाकाव्य, भारतीय अौर पाश्चात्य काव्यशास्त्र का गहराई से विवेचन किया है। भारतीय आलोचना काव्य केंद्रित रही है। पालीवाल जी के आलोचक का मन भी कविता में रमता है। गद्य की अोर वे तब आते हैं, जब कोई विवशता होती है। काव्य आलोचना में वे गहरी डुबकी लगाते हैं। पुस्तकें ‘हिंदी आलोचना का सैद्धांतिक आधार’ (वाणी, 2004) तथा ‘हिंदी आलोचना के नए वैचारिक सरोकार’ [वाणी प्रकाशन, 2007 दूसरा सं०] उनके मानक अलोचना-ग्रंथ माना जा सकते हैं [1]। इनके समेत अन्य पुस्तकों-पं० राम नरेश त्रिपाठी का काव्य, महादेवी की रचना प्रक्रिया, मध्ययुगीन हिंदी महाकाव्यों में नायक, नया सृजन नया बोध, यूनानी अौर रोमी काव्यशास्त्र, सर्वेश्वर अौर उनकी कविता, भवानी प्रसाद मिश्र का काव्य संसार, मैथिलीशरण गुप्त: प्रासंगिकता के अंत:सूत्र, आचार्य रामचंद्र शुक्ल का चिंतन जगत, हिंदी के सैद्धांतिक समीक्षा पर पश्चिम की सैद्धांतिक समीक्षा का प्रभाव, उत्तर आधुनिकतावाद अौर साहित्य, नवजागरण अौर महादेवी वर्मा का रचनाकर्म:स्त्री विमर्श के स्वर, दलित साहित्य के बुनियादी सरोकार, हिंदी आलोचना का उत्तर आधुनिक विमर्श, निर्मल वर्मा: उत्तर अौनिवेशिक विमर्श, हिंदी आलोचना का समकालीन परिदृश्य, उत्तर समय अौर रचनाकर्म का संकट, अज्ञेय के सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकार अौर नवजागरण देशी स्वछंदतावाद अौर नई काव्यधारा आदि के आधार पर उनके आलोचना-वृत्त को रेखांकित किया जा सकता है। इनमें जो प्रमुख बातें उभरती हैं, वे निम्नवत हैं।
1. प्रो० पालीवाल एक सामासिक आलोचक हैं, जो अपने अालोच्य मानक बिना किसी पूर्वाग्रह के विभिन्न विचार-दृष्टियों के समाहार से गढ़ते हैं।
2. उनमें एक वैश्विक जिज्ञासा है, इसलिए आलोचना की नई सरणियों-प्रणालियों को तलाशने का वे हिंदीतर उद्यम भी करते रहते हैं।
3. पूर्वी अौर पाश्चात्य आलोचना शास्त्र का वे सहज सम्मिश्रण कर पाते हैं जिससे आलोचना की संवादात्मकता अौर परस्परता; कृति के मूल्यांकन के लिए एक उत्कृष्ट माहौल पैदा करती है।
4. उनका आलोचना-वृत्त भूगोल (विश्वभर के अनेक अालोचकों तक) अौर इतिहास (संस्कृत अौर रोमन से लेकर उत्तर-आधुनिकतावाद तक) के आयामों की व्याप्ति को एक साथ समेटता है।
5. अद्यतनता की पराकाष्ठा।
6. आलोच्य-कृति के आशय को पाठक (बहुधा विद्यार्थयों) तक पहुँचाने की बेचैनी।
7. चूँकि, उनका आलोच्य-फलक बड़ा अौर बहुआयामी है, इसलिए रचना उसके वृत्त में आते ही अनेक कोणों से आलोकित हो उठती है। अन्य आलोचकों को यही बात निराश करती है। 
इस पृष्ठभूमि के बीच जब हम निर्मल वर्मा को पालीवालीय आलोचना-वृत्त में रखते हैं तो वे सर्वथा नए अर्थों में हमारे समक्ष उपस्थित होते हैं। निर्मल के रचना कर्म पर विचार करने वाले प्रमुख आलोचकों में-नामवर सिंह, अशोक वाजपेयी, रमेशचन्द्र शाह, कृष्णदत्त पालीवाल, जयदेव, सुधीश पचौरी, उदयन वाजपेयी, मदन सोनी, नंद किशोर आचार्य, गगन गिल अौर प्रेम सिंह हैं। अनेक अन्य शोधार्थियों ने निर्मल के रचना कर्म का मूल्यांकन अपने-अपने ढंग से किया है। इस परिप्रेक्ष्य में निर्मल की रचनाअों के बारे में कोई सीधी राय बनाना आसान नहीं है। यहाँ तक कि जब मैं अपना शोध कार्य कर रहा था तब पालीवाल जी से निर्मल को लेकर मैंने अनेक बिंदुअों पर अपनी असहमति व्यक्त की थी। जिसे उन्होंने ज्यों की त्यों मेरे थीसिस में बने रहने दी। थीसिस की रूपरेखा तैयार करते हुए वे निर्मल की ‘मनोभूमिका’ पर बड़ा जोर डाल रहे थे जबकि अपने समाजवादी आग्रहों के चलते मैं इस प्रकार का कोई अध्याय नहीं रखना चाहता था। बाद में जब निर्मल के संश्लिष्ट लेखन से गुजरना हुआ तो यह अध्याय मुझे बहुत जरूरी-सा लगा। अपनी पुस्तक ‘हिंदी आलोचना के नए वैचारिक सरोकार’ का पहला खंड उन्होंने ‘मनोविश्लेषवादी समीक्षा के नए वैचारिक सरोकार’ पर केंद्रित किया है। इसमें मनोविश़्लेषण के कतिपय जटिल आयामों को बड़ी सहजता से उठाया गया है अौर हिंदी समीक्षाशास्त्र से इसकी संगति स्थापित की गई है।निर्मल पर लिखी अपनी पुस्तकों-‘निर्मल वर्मा: उत्तर अौपनिवेशिक विमर्श’ अौर ‘निर्मल वर्मा’ दोनों में वे निर्मल की मनोभूमिकाअों की विशद् पड़ताल करते हैं।निर्मल की रचनाअों के मूल्यांकन के बिंदु निम्नलिखित माने जा सकते हैं:(क) इतिहास, स्मृति अौर मिथक(ख) कला, जीवन अौर सत्य का संबंध(ग) भारत अौर यूरोप की प्रतिश्रुति(घ) धर्म अौर सेक्युलरवाद(ड) उत्तर उपनिवेशवाद, (च) भाषा, यथार्थ अौर आभासनिर्मल, हिंदी में या कहें भारत में सहज ग्राह्य लेखक नहीं है। प्रो० जयदेव ने अपनी पुस्तक ‘द कल्चर अॉफ पास्टिश’ में निर्मल पर पाश्रचात्य संस्कृति को अपनी रचनाअों में उभारने का आरोप लगाया है। वे एक चिथड़ा सुख पर टिप्पणी करते हुए लिखते हैं, ‘Pastiche, whether formal and inter-textual, as in the novels existential aestheticism, or cultural or moral as in its characters, does not happen to be the whole truth about Vermas art. It nevertheless affects it adversely. By figuring in the fiction of a great artist like him, it also earns legitimacy for itself. Finally, it becomes hard to resist because it comes floating on the waves of intense, lyrical prose and stunning formal effects’ [2]. कुछ ऐसे ही विचार भारत अौर यूरोप के आकर्षण के बीच झूलते निर्मल के व्यक्तित्व के बारे में प्रो० सुधीश पचौरी ने अपनी पुस्तक में व्यक्त किए हैं। वे लिखते हैं, ‘उनके (निर्मल) वृतांत बार-बार सूर की गोपियों की तरह कहते हैं: उर में माखनचोर गड़े। अब कैसे हूँ निकसत नाहीं तिरछे ह्वै जु अड़े। तो क्या निर्मल की दबी हुई टैक्स्ट यूरोप के प्रति घनघोर अनुराग की टैक्स्ट नहीं है? अनुराग जो उनके रूपकों अौर व्यंजकों ने दबाया हुआ है? शायद हाँ’! [3]। साफ है, निर्मल के पश्चिम के प्रति आकर्षण-विकर्षण के खेल पर यहाँ तंज कसा गया है। पचौरी जी का मानना है कि निर्मल देशज मनोविज्ञान में नहीं रमते, भारतीयता का गुणगान करते हुए भी वह पश्चिम की अोर ललचाई अाँखों से देखते रहते हैं। जयदेव अौर पचौरी जी से अलग पालीवाल जी ने निर्मल को ठेठ भारतीय परिप्रेक्ष्य में उद्घाटित किया है। या यूँ कहे कि निर्मल को भारतीय अौर विदेशी पाठकों के बीच में बाँटना, वे उचित नहीं मानते। प्रेमचंद अौर रेणु पर सबसे सार्थक कलम चलाने वालों में निर्मल ही हैं जिसे पालीवाल जी रेखांकित करते हैं।निर्मल की इतिहास को लेकर अपनी समझ है। वे वाम विचारकों से भिन्न राय रखते हैं। प्रो० नित्यानंद तिवारी ने लिखा है, ‘सामान्यतया हम लोग इतिहास अौर एेतिहासिक प्रक्रिया को दूसरी तरह से समझते हैं। वह यह कि एेतिहासिक प्रक्रिया में कोई समस्या उभरती है तो उसके हल की संभावना भी कहीं उसमें निहित होती है। निर्मल जी यदि इतिहास को मानते हैं तो संभवत: इस अर्थ में कि हर युग में इतिहास मनुष्य के सामने कुछ ऐसी समस्याएँ पैदा कर खड़ा हो जाता है, जिसे हल करने के लिए कला-विवेक की जरूरत पड़ती है। इन समस्याअों से उलझने के साथ-साथ कला-विवेक को इतिहास के विरुद्ध भी होना पड़ता है [4]।’ निर्मल के कला-विवेक को प्रो० तिवारी ने इतिहास-बोध के आमने-सामने लाकर खड़ा कर दिया अौर एेसा प्रतीत होता है कि निर्मल एेतिहासिक प्रकियाअों की अोर ताकते भी नहीं, जबकि, नंद किशोर आचार्य ने कहा कि, ‘ ‘शुद्ध’ अौर ‘पवित्र’ का मतलब यही है कि कलाकृति किसी मोर्चे पर समर्पण न करे- न इतिहास के मोर्चे पर न विचारधारा के मोर्चे पर, तभी शब्द स्वयं विचार की हैसियत अख्तियार कर पाता है, अन्यथा वह किसी विचारधारा या इतिहास का वाहक बना रहता है [5]। प्रो० कृष्णदत्त पालीवाल ने निर्मल के इतिहास के प्रति नजरिए को लक्षित करते हुए लिखा है कि, ‘निर्मल की मनोभूमिका में ल्योतार, फ़ूकोयामा, हैबरमास के साथ उत्तर-आद्योगिक समाज में ज्ञान की स्थिति, इतिहास एक महाख्यान (ग्रैंड नैरेटिव) तथा नए आख्यानों की स्थिति के प्रश्न टकराते हैं। हैबरमास इतिहास की अव्यवस्था में व्यवस्था को ‘पोस्ट माडर्निटी’ में देखते हैं। समाज में उत्तर-आधुनिकता की धमक ने नैतिकता, धर्म, साहित्य, इंडस्ट्री जैसी चीजों की वैधता समाप्त कर दी है। निर्मल को याद आता है-सुकरात के बारे में नीत्शे का वह कथन था कि वे (सुकरात) पहले वयक्ति थे जिन्होंने ‘हिस्ट्री’ के ‘इल्यूजन’ की शुरुआत की [6]।’ पालीवाल जी निर्मल के इतिहास को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में उद्घाटित करते है। वे ऐसा इसलिए कर पाते है कि उनका आलोचना-वृत्त निरंतर गतिशील रहता है। वह किसी वैचारिक काल-खंड में आकर अटक नहीं गया है। ‘निर्मल वर्मा अौर उत्तर अौपनिवेशिक विमर्श’ में पालीवाल जी ने निर्मल के लगभग हर पक्ष-निबंध, कहानी, उपन्यास, यात्रा-वृत्तांत, नाटक, डायरी, पत्र अौर अनुवाद-कर्म, पर विचार किया है। निर्मल अौर पालीवाल जी में आत्मीय मित्रता थी। पालीवाल जी जब तोक्यो के विदेशी अध्ययन विश्वविद्यालय में अध्यापन कर रहे थे, तब निर्मल अौर गगन जी उनसे मिले थे। दोनों के साझा मित्र अौर जापान में हिंदी भाषा अौर साहित्य के एनसाक्लोपीडिया कहे जाने वाले प्रो० तोषियो तनाका को ही यह पुस्तक पालीवाल जी ने समर्पित की है। जब मैं तनाका जी से पहली बार उनके प्रिय इजागाया (मयखाना) में मिला तो सुरेश ऋतुपर्ण जी मेरे साथ थे। दरअसल तनाका जी के अवकाश प्राप्ति के बाद ऋतुपर्ण जी ही एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे, जो उनसे लगातार संपर्क बनाए रखते थे। जब उन्होंने मुझे पहली बार तनाका जी से मिलवाया तो वे बरबस मेरे शोध के बारे में बात करने लगे। निर्मल वर्मा (विषय) अौर पालीवाल जी (निर्देशक) का नाम सुनकर वे लगभग उछल पड़े थे अौर मेरे सामने वाले कप को आकंठ ‘साके’ से भर दिया था। वे बहुत देर तक निर्मल वर्मा अौर भगवती चरण वर्मा पर बोलते रहे। निर्मल के उनके संस्मरण अद्भुत हैं। अब सोचता हूँ, यदि उस दिन उनकी बातों को रिकार्ड कर लेता तो वह इतिहास बन जाता, नहीं कर पाया तो बस स्मृति भर है। बिना किसी प्रमाण के। इतिहास अौर स्मृति का द्वंद्व निर्मल के लेखन के पूर्व हिंदी साहित्य में शायद ही मुखरता से उठा है। पालीवाल जी ने ठीक लक्षित किया है, ‘निर्मल वर्मा के जीवन का ‘टेक्स्ट’ उनके पाठक के साथ बदलता है। उत्तर आधुनिक बुद्धिजीवियों अौर प्रबुद्ध पाठकों के बीच उनकी रचनाअों का सच पाठक के ‘पाठ’ की मानसिकता पर ही निर्भर करता है कि वह उन्हें किस कोण, विचार दृष्टि, भाव या भूमिका से देखता है क्योंकि किसी भी टेक्स्ट का कोई मूल या स्थाई सत्व नहीं होता। पाठ में सोये अर्थ को पाठक ही जगाकर अर्थ देता है’ [7]। दरअसल हिंदी साहित्य के आलोचना शास्त्र में ‘इतिहास बोध’ की जरूरत आधुनिकता के आगमन के साथ होती रही। तमाम मार्क्सवादी सिद्धांतकारों अौर रचनाकारों ने इतिहास बोध को रचना के मूल्यांकन के लिए एक अनिवार्य कसौटी बना दी। इसका यह भी अभिप्राय निकाल लिया गया कि सामाजिक यथार्थ के बिना रचना महत्त्वहीन हो जाती है। जयशंकर प्रसाद के बारे में भी यह कहा गया कि उनमें इतिहास बहुत है, पर इतिहास बोध नहीं। जैनेंद्र, अज्ञेय, निर्मल भी इसी श्रेणी में माने गए जिसका प्रतिवाद स्वयं रचनाकारों अौर अन्य आलोचकों ने दिया। इस बीच स्वयं साहित्य की सैद्धांतिकियों में भारी बदलाव आ चुका है, जिससे रचनाअों को देखने का बहुलतावादी दृष्टिकोण विकसित हुआ है। पालीवाल जी जब अपनी कक्षाअों में अध्यापन करते थे तो वे सहसा एक विचार से दूसरे पर पहुँच जाते थे। हम विद्यार्थयों को उनका यह करतब विस्मित अौर प्रेरित करता था, परंतु उनके सहयोगी उनका मज़ाक भी उड़ाया करते थे। मुझे याद पड़ता है कि पालीवाल जी की अध्यापन शैली पर, प्रो० पचौरी से सहज चर्चा होने लगी। उन्होंने गोपाल प्रसाद व्यास की एक काव्य पंक्ति को बदलकर कहा-‘पालीवाल जी का स्टाइल ‘तलवार चली, तलवार चली’ (व्यास जी की पंक्ति ‘सलवार चली, सलवार चली’ है) वाला है।’ निश्चय ही वे पालीवाल जी की आवेगधर्मिता को इंगित कर रहे थे, जिससे हम सब छात्र बखूबी परिचित हैं। ऐसा करके वे हमें उस छोटी सी क्लास में एक व्यापक फलक पर पहुँचाने का काम करते थे। मुझे इसका लाभ भी मिला अौर हिंदी पढ़ते हुए आज भी यदा-कदा एंथ्रोपोलोजी की पुस्तकों तक जो हाथ ललक के साथ उठ जाते हैं, यह उनके अध्यापन का ही प्रताप है।  पालीवाल जी के आलोचना-वृत्त में रचना अौर रचनाकार एक-दूसरे के पूरक बने रहते हैं।उनकी आलोचना पाठ को, लेखक की छाँव में ही, पाठक तक पहुँचाती है। इसलिए जब हम उनकी आलोचना से गुजरते हैं तो रचना अौर उसका सर्जक; दोनों का प्रतिबिंब उभरता चला जाता है। यह हमारी देशज आलोचना शैली है। जब पश्चिम की अनेक आलोचना-शैलियों में पाठ की केंद्रीयता बढ़ रही थी, तब भी पालीवाल जी लेखक के व्यक्तित्व को अपने अलोचना-वृत्त में रेखांकित कर रहे थे। ‘निर्मल वर्मा’ [8] अौर ‘निर्मल वर्मा अौर उत्तर अौपनिवेशिक विमर्श’ [9] दोनों पुस्तकों के शीर्षक इसी का इंगित कर रहे थे। वैसे हिंदी में कुछेक लेखक अपने व्यक्तित्व के चलते अपनी रचनाअों के साथ बराबर चर्चा में रहे हैं। अज्ञेय इसमें अग्रणी थे। निर्मल भी अपने बयानों, कम्यूनिस्ट प्रेम अौर मोहभंग आदि के कारण ऐसे ही लेखकों की श्रेणी में आ खड़े हुए थे। हिंदी के मूर्धन्य आलोचक अशोक वाजपेयी ने जब निर्मल वर्मा की रचनाअों का मूल्यांकन करने हेतु पुस्तक का संपादन किया तो उसका शीर्षक ‘निर्मल वर्मा’ [10] ही रखा। प्रो० पचौरी [11] अौर उदयन वाजपेयी [12] की पुस्तकों के शीर्षक भी यही कहानी कहते हैं। कहना न होगा की निर्मल का अालोचक उनके व्यक्तित्व की आभा से घिर जाता है। इसका कारण, हिंदी में, निर्मल के पाठ का अनूठापन है।पालीवाल जी निर्मल की डायरी अौर संस्मरणों को बड़ी आत्मीयता से अपने अलोचना-वृत्त में उकेरते हैं। इसमें उनका मन रमता चला जाता है। निर्मल के पश्विम के प्रति आकर्षण अौर भारतीयता के महिमामंडन पर विचार करते हुए पालीवाल जी अपनी टीप देते हैं, ‘बुद्धि से, विचार से निर्मल वर्मा पश्चिमी संस्कृति के खटके से बेचैन प्रश्नाकुल रहे हैं, लेकिन भाव अौर संस्कार से भारतीय परंपराअों, मिथकों, गाथाअों, लोक समृतियों, नदियों-तीर्थों-अनुष्ठानों-पर्वों में उनका मन बसता है। एक छोर पर यूरोप दूसरे छोर पर पूर्व या भारत। एक छोर पर इतिहास दूसरे छोर पर स्मृति।निर्मल वर्मा दोनों में संतुलन बैठाने की जी तोड़ कोशिश करते हैं अौर यह प्रत्यय कम मूल्यवान नहीं है [13]।’पचौरी जहाँ निर्मल के इस प्रत्यय को ‘दुविधा’ मानते हैं, पालीवाल वहीं इसे ‘संतुलन’ की संज्ञा देते हैं।दरअसल अपनी यूरोप यात्रा के बाद निर्मल मार्क्सवादी विचारकों को संशय से देखने लगे थे। माक्सवादी विचार अौर कर्म की द्विधा ने निर्मल के आखिरी संबल को छीन लिया था। यह निहत्थापन बाद के दिनों में अौर गहरा होता गया। भारत के आपातकाल के दिनों के बारे में निर्मल वर्मा की इसी वेदना को रेखांकित करते हुए पालीवाल जी ने लिखा, ‘उन्हें इस बात की अपार पीड़ा थी कि हिंदी की क्रांतिकारी विद्रोही कबीरी परंपरा का कायरता से सिर क्यों झुका हुआ है। क्यों हिंदी के प्रगतिशील लेखकों अौर संपादकों की जीभें तालू से लग गयी हैं? इसका उत्तर कौन देगा [14]? पालीवाल जी ने निर्मल के उस कथन का उल्लेख किया जिससे पता चलता है कि रघुवीर सहाय, धर्मवीर भारती अौर नागार्जुन आदि ने कैसे आपातकाल में माफी माँगी थी अौर लेखक समुदाय को कलंकित किया था। डायरी पर अपनी राय देते हुए पालीवाल जी ने लिखा, ‘डायरी जीवन की चुनिंदा, सजी-धजी नायिका होती है जो भीतरी कमरे से अपने को सँवारकर कर बाहर निकलती है। पूरी सावधानी से अपने समय, समाज, संस्कृति, साहित्य, धर्म, कला, सिनेमा, घटना-प्रसंग, मार्मिक प्रकरण, प्रेमाख्यान अौर व्यक्तियों के संपर्क पर की गई टिप्पणियों में ऐसा बहुत कुछ ‘अनकहा’ रह जाता है जिसके ‘पाठ’ का अलग से भाष्य करना पड़ता है। उसमें लेखक के वे टुच्चे-लुच्चे, कमीने, कमसिन समझौते भी शामिल होते हैं जिन्हें निर्मल क्या कोई भी मोहन राकेश या कृष्णबलदेव वैद नहीं कहना चाहता [15]।’ पालीवाल जी को निर्मल के बाद के रचनाकर्म में एक फ्यूजन नजर आता है। वे लक्षित करते हैं, ‘आरंभ में अंग्रेजी में कविताएँ लिखने वाला निर्मल का ‘कवि’ बाद के लेखन में एक ऐसा गद्यकार बन गया जो कहानी, निबंध, यात्रावृत्त-संस्मरण, रिपोर्ताज, डायरी की समस्त विधाअों को फेंटकर अपने ‘फ्यूजन’ से लुभाने लगा [16]।’ सन् 2015 की गर्मियाँ थीं, मैं अपने कुछ मित्रों के साथ तोक्यो के उत्तर में शिजूअोका की अोर जा रहा था। कारण था कि अज्ञेय जी ने अपनी एक पुस्तक में इस भूगोल का बड़ा अकर्षक वर्णन किया है। स्व० लक्ष्मीधर मालवीय ने लिखा है अज्ञेय जी ने उनसे कहा था कि मुझे पर्वत उतना ही प्रिय है जितना कि सागर तट। यदि मुझे कहीं बसने के लिए स्थान चुनना हो तो मैं ईज़ु को चूनूँगा, यहीं दोनों ही एक साथ देख सकते हैं [17]।’ इस दुनिया में रहने की सबसे अच्छी अौर सुंदर जगह को देखना। मन लालायित था। जिस सागर अौर पर्वत बिंब का वर्णन अज्ञेय जी ने किया था वह अतामी स्टेशन के बाद शुरु हो गया था। अज्ञेय अौर निर्मल के संस्मरण प्रकृति अौर भूगोल को जीवंत बना देते हैं। निर्मल की डायरियाँ अौर स्मृति लेख हमें एक अंतरयात्रा पर ले जाते हैं।   चाहे भवानी भाई हों, अज्ञेय, माखनलाल चतुर्वेदी या कोई अन्य वह पालीवाल जी के आलोचना वृत्त में आकर नए ढंग से अलोकित हो उठता है। क्योंकि पालीवाल जी प्रोफेशनल आलोचक नहीं हैं। उनके विद्यार्थियों के प्रश्न उन्हें एक जीवंत अालोचक बनाते हैं। इसलिए उनका आलोचना-वृत्त जड़ परिधि से निर्मित नहीं होता, अपितु गतिशील रेखाअों से आकार पाता है।

संदर्भ एवं टिप्पणियाँ
[1] सिंह, विजय बहादुर. 8 फरवरी, 2018. ‘प्रो० कृष्णदत्त पालीवाल स्मृति व्याख्यान’ कला संकाय, दिविवि, दिल्ली. 
[2] Jaidev. 1993. The Culture of Pastiche-Existential Aestheticism in the Contemporary Hindi Novel, Indian  
      Institute of Advanced Study, First Ed. Shimla. p. 95.
[3] पचौरी, सुधीश. 2003. निर्मल वर्मा अौर उत्तर-उपनिवेशवाद, प्रथम सं०. राधाकृष्ण, दिल्ली. पृ० 47.
[4] तिवारी, नित्यानंद. 1989. अकेलेपन से सन्यासवाद की अोर. निर्मल वर्मा: सृजन अौर चिंतन, सं० प्रेमसिंह, प्रथम सं०. फ़िफ्थ डायमेंशन  
      पब्लिकेंशंस, दिल्ली. पृ० 26.
[5] आचार्य, नंद किशोर, 1989. समय की फुसफुसाहट को सुनते हुए. निर्मल वर्मा: सृजन अौर चिंतन, सं० प्रेमसिंह, प्रथम  सं०. फ़िफ्थ डायमेंशन   
     पब्लिकेंशंस, दिल्ली. पृ० 116.
[6] पालीवाल, कृष्णदत्त. 2009. रचनाकार कि मनोभूमिका. निर्मल वर्मा,  प्रथम सं०. साहित्य अकादमी, नई दिल्ली. पृ०  15.
[7] पालीवाल, कृष्णदत्त. 2012. निर्मल वर्मा अौर उत्तर अौपनिवेशिक विमर्श,  प्रथम सं०. भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली. पृ० 42.
[8] पालीवाल, कृष्णदत्त. 2009. रचनाकार कि मनोभूमिका. निर्मल वर्मा,  प्रथम सं०. साहित्य अकादमी, नई दिल्ली.
[9] पालीवाल, कृष्णदत्त. 2012. निर्मल वर्मा अौर उत्तर अौपनिवेशिक विमर्श,  प्रथम सं०. भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली. पृ० 42.
[10] वाजपेयी, अशोक. 1990. निर्मल वर्मा, प्रथम सं०. राजकमल, नई दिल्ली.
[11] पचौरी, सुधीश. 2003. निर्मल वर्मा अौर उत्तर-उपनिवेशवाद, प्रथम सं०. राधाकृष्ण, दिल्ली.              
[12] वाजपेयी, उदयन. 2000. कथा पुरुष-निर्मल वर्मा पर चार निबंध, प्रथम सं०. वाग्देवी, बीकानेर.
[13] पालीवाल, कृष्णदत्त. 2012. निर्मल वर्मा अौर उत्तर अौपनिवेशिक विमर्श,  प्रथम सं०. भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली.पृ० 75.
[14] पालीवाल, कृष्णदत्त. 2012. निर्मल वर्मा अौर उत्तर अौपनिवेशिक विमर्श,  प्रथम सं०. भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली.पृ० 30.
[15] पालीवाल, कृष्णदत्त. 2012. निर्मल वर्मा अौर उत्तर अौपनिवेशिक विमर्श,  प्रथम सं०. भारतीय ज्ञानपीठ,  नई दिल्ली.पृ० 265.
[16] पालीवाल, कृष्णदत्त. 2012. निर्मल वर्मा अौर उत्तर अौपनिवेशिक विमर्श,  प्रथम सं०. भारतीय ज्ञानपीठ,  नई दिल्ली.पृ० 234.
[17]  मालवीय, लक्ष्मीधर. इजु के सागर तट पर, अपने अपने अज्ञेय, अोम थानवी (सं०) खण्ड एक, प्रथम सं०. वाणी,  नई दिल्ली.पृ० 344.



राम प्रकाश द्विवेदी
ई-मेल: ram.dwivedi@bramb.du.ac.in
2602, कैलाश नगर, दिल्ली-११००३१

राजा है तो सीताफल से डरेगा ही !

               
युवा कथाकार प्रवीण कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती कॉलेज में असिसटेंट प्रोफेसर हैं। उनका उपन्यास 'छबीला रंगबाज का शहर' एक लोकप्रिय पुस्तक रही है। हाल ही में उन्होंने 'एक राजा था जो सीताफल से डरता था' कहानी लिखी है। 
             

[अज्ञेय ने 1935. केविशाल भारतमें जैनेन्द्र कुमार के कहानी-संग्रहदो चिड़ियाँकी समीक्षा करते हुए लिखा था, “जो लोग कहानी सिर्फ वक्त बिताने के लिए नहीं पढ़ते, उन्हें यह संग्रह अवश्य पढ़ना चाहिए.”(1) चौखटें बाँधने को भले ही साहित्य और ज्ञान की दुनिया में (कहने के स्तर पर ही सही) अनुचित माना जाता हो पर आलोच्य कहानी और प्रस्तुत लेख के लिए अज्ञेय की यह चौखट उपयुक्त ठहरती है.]

नीचे पारदर्शी इमारतें और ऊपर एक नहीं अनेक सूर्य, रात-दिन के विधान से परे उजाले के राज से गतिमान (जिसमें सिर्फ दिन ही दिन होता है, रात का कोई स्थान नहींसैषा सर्वत्र प्रकाशम्) ; ऐसा भी एक राज्य है. नाम हैवर्तुल’. इस और उस दुनिया का तो पता नहीं, पर प्रवीण कुमार की इधर प्रकाशित कहानी में अवश्य है. जितना अनोखा यह राज्य है उतना ही अनूठा है इसकी दास्तान का शीर्षक भी – ‘एक राजा था जो सीताफल से डरता था’. अब बताइए कितना ही कह लीजिये कि नाम में क्या रखा है, पर यहाँ तो नाम ही कमाल कर जाता है. इसके आकर्षण का एक अपना जादू है जो पाठक की निगाहों को ठहरा (क्या जमा ही) लेता है. एक तो राजा, जो स्वयं ही बीते समय की बात हो चुका है और वो भी ऐसा-वैसा नहीं नींद को जीत चुका, कभी सोने और थकने वाला राजा; पर हमारे जैसे साधारण-दुर्बलों की भूख का अमूमन शिकार होने वाले सीताफल से जिसकी हवा सरक जाती है. यों इस कालातीत, अलौकिक और दैवीय शक्ति-सम्पन्न महापुरुष के सामने एक सीताफल की क्या बिसात! और अगर कुछ होने की संभावना भी बनती है तो वो परीकथाओं या जादुई किस्सों में ही हो सकती है, जहाँ तो एक तोते के भीतर विशालकाय राक्षस की भी जान बस सकती है. पर समस्या का समाधान तो इतने भर से भी नहीं होता क्योंकि ऐसी स्थिति में तो इस कहानी पर चर्चा की क्या ही आवश्यकता! कहने की आवश्यकता नहीं कि मध्यकालीन किस्से में आधुनिक जटिलताओं से जूझते व्यक्ति के मन को थोड़ी देर बहलाने का सामर्थ्य तो भले ही हो पर उसे रमाने की योग्यता से वह वंचित ही रह जाता है. फिर भला इसवर्तुलराज्य में ऐसा क्या है जो यह पाठक को रमा लेता है? बात और ज्यादा तब उलझ जाती है जब कहानी पर नजर डालते हैं. हमारी दुनिया से भिन्न एकदम अलग संसार. दो भिन्न-भिन्न दुनिया लेकिन फिर भी कुछ ऐसा जो भीतर से जोड़ता हो. अमूमन तो यही देखा जाता है कि जो रचना जितनी ज्यादा रचनात्मक विश्वसनीयता अर्जित करती है वह उतनी ही अधिक पाठक से जुड़ने में सफल होती है और रचनात्मक विश्वसनीयता अर्जित करने के लिए आवश्यक है कि रचना के भीतर के संकट, संघर्ष, द्वंद्व, मानसिक उद्वेलन, उसका परिवेश आदि हमें प्रामाणिक लगे. उसे पढ़ते हुए महसूस हो कि जैसे हमारी ही तो बात लिखी जा रही है. उसके होने का कोई कोई सूत्र हमारे अनुभव के सिरों से जुड़ा हो. किन्तु यहाँ तो एक दूसरा ही संसार है पर फिर भी जुड़ाव महसूस होता है! कार्य है तो कारण भी होगा ही और कारण है इसमें प्रयुक्त फैंटेसी शैली. परन्तु अगर मान भी लिया जाए कि फैंटेसी के कारण ही इस रचना का संसार एकदम भिन्न प्रतीत होते हुए भी हमें जोड़ लेने का सामर्थ्य रखता है तो भी दो प्रश्न और तैयार मिलते हैं. एक तो यह कि कैसे और दूसरा, क्या इतने भर से ही इस रचना का महत्त्व स्वीकारा जा सकता है? अगर फैंटेसी होना ही किसी रचना के महत्त्व का आधार होता तो फिर फैंटेसीयुक्त रचनाओं के एक बड़े तबके को बालोपयोगी शिक्षाप्रद मनोरंजक कथाएँ-किस्से कहकर आगे बढ़ जाने की प्रवृत्ति क्यों पाई जाती? स्थिति यहाँ कुछ-कुछ उस्ताद ग़ालिब के शे जैसी ही है – “मरीज़ इश्क़ पे रहमत ख़ुदा की / मर्ज बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की.” जितना जवाब खोजने का प्रयत्न किया जा रहा है बात है कि उतनी ही उलझती जा रही है. इन गुत्थियों को सुलझाने और कहानी इसके रचनात्मक अवदान को समझने के लिए फैंटेसी की अवधारणा से गुजरना होगा.
         अलबत्ता फैंटेसीलार्जर दैन लाइफहोती है पर इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि यह जीवन से मुक्त कुछ-भी उलजलूल होती है. फैंटेसी असल में जीवन को व्यक्त करने की कलात्मक युक्ति है. कबीरदास का प्रसिद्ध दोहा है – “जल में कुम्भ कुम्भ में जल है बाहर भीतर पानी. / फूटा कुम्भ जल जलहि समाना यह तथ कह्यो ग्यानी..” जल, जीवन का यथार्थ है और कुम्भ फैंटेसी. फैंटेसी अपने लिए कथ्य जीवन से ही तलाशती है और उसे रचने के बाद भी जीवन को ही व्यक्त करती है. प्रेमचन्द ने अपने प्रख्यात निबंध (मूलतः व्याख्यान) ‘साहित्य का उद्देश्यमें घोषणा की थी – “मेरा अभिप्राय यह नहीं है कि जो कुछ लिख दिया जाए, वह सबका सब साहित्य है. साहित्य उसी रचना को कहेंगे, जिसमें कोई सचाई प्रकट की गयी हो, जिसकी भाषा प्रौढ़, परिमार्जित और सुंदर हो, और जिसमें दिल और दिमाग पर असर डालने का गुण हो और साहित्य में यह गुण पूर्ण रूप में उसी अवस्था में उत्पन्न होता है, जब उसमें जीवन की सचाइयाँ और अनुभूतियाँ व्यक्त की गयी हों.” आगे प्रेमचन्द अपनी इस मान्यता से बिना फैंटेसी शब्द का प्रयोग किये उसे जोड़ देते हैं, “साहित्य में प्रभाव उत्पन्न करने के लिए यह आवश्यक है कि वह जीवन की सचाइयों का दर्पण (बिना नाक-मुँह मसोडे इसे लक्षणा में समझना उचित होगा) हो. फिर आप उसे जिस चौखट में चाहें, लगा सकते हैंचिड़े की कहानी और गुलो-बुलबुल की दास्तान भी उसके लिए उपयुक्त हो सकती है.” ‘जिस चौखट में चाहेंऔर आगे दिए गये उदाहरणों की प्रकृति से साफ़ है कि उनका इशारा फैंटेसी की ओर ही था. यथार्थ की अभिव्यक्ति (जिसे प्रेमचंदजीवन की सचाईकह रहे हैं) ही फैंटेसी की प्रभावोत्पादकता की धुरी है. यही विशिष्टता विश्व-प्रसिद्ध फैंटेसी युक्त रचनाओं को मनोरंजक और बालोपयोगी कही जाने वाली फैंटेसी रचनाओं से भिन्न करती रही है. कारण साफ़ है कि रचनात्मक विश्वसनीयता अर्जित करने के लिए रचनाकार को यथार्थपरक होना ही होगा. शिल्प और उसकी युक्तियों-प्रविधियों में वह भले ही कितनी ऊँची उड़ान भर ले पर कथ्य के पाँव यथार्थ की जमीन पर ही टिके होने चाहिए. सुखद है कि प्रेमचन्द की कसौटी पर सार्थक उतरती प्रवीण कुमार कीएक राजा था जो सीताफल से डरता थादूसरी दुनिया के सृजन के माध्यम से हमारी दुनिया को समझने का प्रयास है
        यह कहानी मानवीय सभ्यता के विकास का आख्यान है. आरम्भ में आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मनुष्य नित नये-नये आविष्कारों की ओर प्रवृत्त हुआ. मानवीय आवश्यकताओं की बुनियादी खोजों (फसल, आग इत्यादि) के बाद इसमें उसकी बढ़ती जिज्ञासा और महत्त्वाकांक्षाओं का तत्त्व भी जुड़ता गया. जल्द ही सामूहिक रूप से रहने की जो शुरुआत जंगली जानवरों से बचाव आदि के लिए शुरू हुई थी वह अपनी फसल आदि संसाधनों के संरक्षण के लिए जरूरी हो गयी. संरक्षण का भाव अतिरिक्त की चाह पैदा करता ही और अतिरिक्त की चाह की पूर्ति एक सीमा के बाद दूसरे के हिस्सों से ही होती. इस तरह शुरू हुए सामूहिक संघर्ष, सुव्यवस्थित सैन्य निर्माण, व्यापार-व्यवस्था आदि और फिर धीरे-धीरे राज्य-गठन की प्रक्रियाओं ने सभ्यताओं का विकास किया. उसके बाद की सभ्यता की कहानी धर्म, शासन और व्यापार के गठजोड़; और धीरे-धीरे व्यापार के बढ़ते प्रभुत्व की कहानी है. ‘एक राजा था जो सीताफल से डरता थासभ्यता के इसी चरण को अपना उपजीव्य बनाती है. शुरुआत में ही वाचक (नैरेटर) सूचित कर देता है कि वर्तुल में नये राजा के आने के कुछ समय में ही राज्य के लिएनगरऔर राजा के लिएप्रजा प्रियका व्यवहार होने लगा था. शब्दों का यह परिवर्तन तो मुख-सुख के नियम का परिणाम था और ही महज भाषाई तब्दीली का और फिर भाषा सम्प्रेषण का माध्यम-भर ही नहीं चेतना की वाहक भी होती है. इस शाब्दिक हेराफेरी के बीज बदलती व्यवस्था के भीतर मिलते हैं. चरमराते राज्य की बागडोर संभालते ही प्रजाप्रिय सबसे पहले व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा देते हैं. एक क्या धीरे-धीरेनगरके चारों दरवाजें व्यापार के लिए खोल दिए जाते हैं. व्यापार बढ़ता है तो उसकी विशेषतासरप्लसकी चाह भी फैलने लगती है. अतिरिक्त की हवस. असामान्य प्रजाप्रिय को सामान्य उन्नति से संतोष कहाँ ही मिलने वाला था. व्यापारिक गतिविधियों के बढने में सबसे बड़ी अडचन थी रात (और उसका अँधेरा), इसलिए रात को ही मिटा देने का निश्चय किया जाता है. बहुत-से सूर्य आसमान में टाँगे जाते है! प्राकृतिक विधानों पर तो फिर भी एक हद तक नियंत्रण पा लिया जाता है(?) किन्तु पशु-पक्षियों की नैसर्गिक आदतों का क्या? वो तो रात होते ही ऊँघने लगते थे या अपने स्वभावानुसार आवाजें निकालना शुरू कर देते थे. ऐसे में रात-दिन का अद्वैत स्थापित नहीं हो पा रहा था तो इन्हें खत्म करने का फैसला लिया जाता है. व्यापारियों के सहयोग से शासन के अथक परिश्रम द्वारा पशु-पक्षियों के खात्मे का योजनाबद्ध कार्यक्रम शुरू किया जाता है! बाकायदा प्रशिक्षित बहेलियों की तमाम अत्याधुनिक उपकरणों के साथ नियुक्ति की जाती है और इस तरहवर्तुलप्रकृति के तमाम विधानों और संसार की नैसर्गिकता से ऊपर उठ जाता है. व्यापारिक उन्नति से खुशहाली है कि बढती ही चली जाती है, इतनी कि प्रजा में यह बात लोकोक्ति की तरह ही प्रचलित हो जाती है – “ये स्वर्ग क्या होता है? जो है बस वर्तुल है.” पढने की प्रक्रिया में लगने लगता है कि तुलसी जिसरामराज्यकी बात कर रहे थे वहवर्तुलही है (संरचनागत भिन्नता भले ही हो पर मूल प्रकृति में तो है ही)! किन्तु वर्तुल की प्रिय प्रजा के प्रजा प्रिय हैं कि संतुष्ट ही नहीं होते
        यह तो रहा क्रमिक विकास, परन्तु कुछ घटनाएँ या सूत्र ऐसे होते ही हैं जो विशेष ध्यान की माँग करते हैं. यहीं से रचना अपने अर्थ की गहराई ग्रहण करती है. आचार्य शुक्ल कीमार्मिक स्थलों की पहचानइसी तरह की कसौटी है हालाँकि विधागत भिन्नता (कविता और कहानी) और परिस्थितियों में हुए बदलावों (वैज्ञानिक प्रगति, तकनीकी विकास, आधुनिक जीवन की जटिलता आदि) के कारण यह कहानी के लिए ठीक उसी रूप में लागू नहीं होती. बहरहाल, इस कहानी के ऐसे सूत्रों की चर्चा के बगैर इसकी व्यापकता और गहराई का भान सम्भव ही नहीं. इनकी व्याख्या से लेख को एकदम अकादमिक बनाने की मेरी कोई योजना नहीं. बस कुछ प्रसंगवश इनकी ओर संकेत कर देना ही उचित रहेगा. प्रकृति का विध्वंस इंसान की अतिरिक्त की हवस की दुष्परिणति है. गाँधी जी ने सही कहा था कि प्रकृति सबकी आवश्यकताओं की पूर्ति को कर सकती है पर इच्छाओं की नहीं. और इच्छाओं का क्या, वो तो बढती ही चली जाती हैं. इतनी कि उनका अंत अनंत है. वर्तुल में भी यही हुआ. राजा को जिस अंतहीन विकास की हवस थी वह प्रकृति और उसकी नैसर्गिकता के विध्वंस पर ही संभव था. कितने योजनाबद्ध ढंग से उसे किया गया यह तो ऊपर वर्णित हो चुका, परंतु उसके लिए व्यापारिक गतिविधियों में जिस उछाल की जरूरत थी उसको हासिल किये जाने का रोचक वर्णन रचनाकार ने किया है. एक रात राजा भयानक सपना देखता है जिसकी व्याख्या कुलगुरु वांदीकबहुत सोचने के बादकरते हैं – “इस राज्य पर शनि का प्रकोप था. शनि ने यहाँ सात साल राज किया है, बस अब छः माह बच गये हैं. साढ़ेसाती पूरी होने वाली है, अतः शनि अब राज्य छोड़ना चाहते हैं. लेकिन जिन दरवाजों से उन्हें जाना है वह बंद पड़े हैं, इसलिए राज्य के शेष तीनों सिंहद्वार भी खोलने होंगे.” शनि के जाने का तो पता नहीं पर व्यापरियों के आने में अविश्वसनीय बढ़ोतरी हो गयी. अब यहाँ एक बात गौर करने लायक है कि कभी सोने वाले राजा को सपना कैसे आया? वाचक आरंभ में ही स्पष्ट कर देता है – “भाग्यदेवी ने उनके हिस्से में नींद पहले ही नहीं लिख रखी थी....” अब जब नींद आती ही नहीं तो सपना कैसा! क्या रचनाकार वस्तुगत भूल कर बैठा? इतने जटिल शिल्प-प्रविधि में इस तरह की विषयवस्तु को पिरोने में जाने कितनी ही बार कहानी का सृजन किया गया होगा और जाने कितनी ही बार इसके भीतर से गुजरा गया होगा. ऐसे में यह सायास गलती लगती है और जब सायास है तो फिर इसका कोई गूढ़ निहितार्थ भी रहा ही होगा. यों फैंटेसी का शिल्प रचनाकार से अतिरिक्त सतर्कता और सजगता की माँग भी करता है क्योंकि पूरे पाठ के प्रतीकों और लक्षणा में होने में हर छोटी-सी छोटी बात से अर्थ की दिशा ही बदल जाने का भय भी रहता है. रचनाकार का ध्येय स्पष्ट है कि प्रजा को बताया जा रहा स्वप्न मिथ्या है. जब नींद ही नहीं आती तो सपना ही नहीं सकता और जब सपना आया ही नहीं तो यानी किसी ख़ास प्रयोजन के तहत ही एक सपने को गढ़ कर प्रचारित किया जा रहा है. सपने की विषयवस्तु औरबहुत सोच के बादगुरु वांदीक द्वारा की गयी व्याख्या से जाहिर होता है कि नगर के चारों द्वार खुलवाने के लिए यह प्रपंच रचा गया था. शनि के जाने के लिए नहीं बल्कि व्यापारियों के आने के लिए इन द्वारों को खोला गया. इन द्वारों का इस तरह पूरी तरह खोला जाना सरकारों के व्यापारियों को निरंतर निरंकुशता प्रदान करते रहने का प्रतीक है. इस तरह सत्ता (प्रजाप्रिय का कल्पित स्वप्न) और धर्म (गुरु वान्दीक की पहले से तय होने के बावजूदबहुत सोच करकी गयी व्याख्या) के गठजोड़ द्वारा प्रजा को मूर्ख बनाते हुए व्यापार-व्यवसाय (पूँजीवाद) को प्रदान की गयी निरंकुशता पर ध्यान केन्द्रित करने के लिये रचनाकार ने ऐसा किया. ऐसा नहीं है कि सायास लापरवाही द्वारा अर्थ-संवर्धन की यह युक्ति प्रवीण कुमार ने सर्वप्रथम प्रयुक्त की है. इसका कुशल प्रयोग उदय प्रकाश के यहाँ भी मिलता है. ‘और अंत में प्रार्थनाके उदाहरण से बात स्पष्ट होगीअब इसका क्या किया जाए कि डॉक्टर दिनेश मनोहर वाकणकर किसी कहानी या उपन्यास के पात्र नहीं हैं। उन्हें किसी कहानीकार की कल्पना ने नहीं पैदा किया है। डॉक्टर वाकणकर किसी कहानीकार या रचना के होने या होने के बावजूद हैं।कुछ-कुछ उसी तरह जैसे हम और आप हैं। क्या हमें होने के लिए किसी रचना के होने की ज़रूरत है?” रचनाकार ने कहानी के मुख्य शीर्षक के नीचे कोष्ठक में सूचना दी है किइस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैंऔर यह वाचक तो कह रहा है कि वाकणकर को किसी कहानीकार की कल्पना ने पैदा नहीं किया है। वाचक की सत्ता यहाँ अलग से रेखांकित हो रही है जो पाठ की भीतर की सत्ता है और पाठ के भीतर ही अपना वजूद पाने वाला यह वाचक पूछ रहा है कि, ‘क्या हमें होने के लिए किसी रचना के होने की ज़रूरत है?’ वाचक अगर कहानी का पात्र होता तो फिर तो वह यह दावा किसी सीमा तक कर भी सकता था पर मजे की बात तो यह भी है कि वह कहानी का पात्र भी नहीं. ऐसे में साफ़ है कि इस कहानी का रचनाकार और वाचक एक ही होने चाहिए, किन्तु फिर यह अंतर पैदा करने वाले कथन कैसे? यह भी सायास संयोजन है. इसके प्रयोजन आदि की चर्चा करना तो अवांतर प्रसंग होगा. इसी से वर्तुल राज्य पर आना ही उचित होगा
          पूँजीवादी व्यवस्था की निरंकुशता के दुष्प्रभाव होने ही थे. प्राकृतिक विध्वंस की तो शर्त पर ही इसने विकास किया पर तबाही यहीं तक नहीं रुकी. विज्ञान जिसके प्रादुर्भाव का लक्ष्य मनुष्य जाति का विकास माना जाता था वह जल्द ही पूँजी की भूख की पूर्ति के लिये अधिक प्रतिबद्ध होने लगा और धीरे-धीरे तकनीक उसका पर्याय बन गयी. उसकी खोजों तक का महत्त्व उसकी व्यापारिक उपयोगिता के आधार पर किया जाने लगा. विज्ञान ही क्या ज्ञान के तमाम अनुशासन पूँजी के इर्द-गिर्द मक्खी की तरह मँडराने लगे और जो ऐसा करने में नाकाम रहें उनकी प्रासंगिकता को धीरे-धीरे कम किया जाने लगा. वर्तुल में जब भिन्न किस्म के सीताफल की खोज होती है तो राज-सहयोग द्वारा विद्वानों का एक बड़ा दल उस पर विभिन्न प्रयोग करता है जिससे और भी बहुत-सी खोजे हो जाती हैं. उन्हें जब राजसभा में प्रस्तुत किया जाता है तो रचनाकार बारीकी से उस दृश्य का अंकन करता है – “इन महान खोजों से होने वाली व्यापारिक उपलब्धियों के बारे में सोचकर उनकी आँखें हीरे की तरह चमक गयी थीं.” सामान्य जिंदगी की तरह वर्तुल में भी व्यापार का इतना आतंक था कि नगर का उत्थान, उपलब्धियाँ आदि सब व्यापारिक ही थीं. क्योंकि पूँजीवादी व्यवस्था कीसरप्लसकी हवस दूसरे के हिस्से के संसाधनों का दोहन कराती ही है तो ऐसे में यह आवश्यक है कि सामान्य जनता की चित्त-निर्मिति(माइंड-मेकिंग) इस तरह से की जाए कि उनका ध्यान अप्रत्यक्ष रूप से हो रहे उनके शोषण की ओर जाए ही . होगा साँप बजेगी बाँसुरी. जब यथार्थ-बोध होगा ही नहीं तो प्रतिरोध की संभावनाएँ भी पैदा होगी ही नहीं. इसलिए उसकी सोचने-समझने की प्रक्रियाओं पर हमला किया जाता है. इसका सबसे आसान रास्ता है कि उन्हें कुछ ऐसे झुनझुने उपलब्ध करा दो जिसे बजाने में ही उनका सारा वक़्त जाया हो जाए. मानव सभ्यता के विकास में अक्सर इसका प्रयोग किया जाता रहा. आज के समय का फ्री इन्टरनेट भी ऐसा है कि पूरा समय आप गैजेट्स पर व्यस्त रहें और सोचने-समझने की जहमत उठानी ही पड़े. वर्तुल में भी प्रजाप्रिय जनता को मनोरंजन-प्रिय बनाता जाता है. मनोरंजन अनिवार्य है पर उसकी अधिकता हमारे चिंतन की बाधक और सत्ता-व्यापार का हथियार बनती है. यों वर्तुल में मनोरंजन खूब होता ही था पर जैसे ही सीताफल वाली समस्या पैदा हुई वैसे हीभांडों, नटों, नर्तकियों और मसखरों की संख्या नगर में और बढ़ गयी थी, वे हर नये पहर कुछ नया लेकर आते. वैसे भी अब उनको करमुक्त नागरिकों की श्रेणी में रखा गया था.’ 
            मनोरंजन की अधिकता धीरे-धीरे हमारे सोचने-समझने की प्रक्रिया को ख़त्म करती है. जब सोचना-समझना कम होने लगेगा तो अपने समय और समाज से सम्पर्क कटने लगेगा. इसके बाद मनोरंजनप्रियता आदत बनती है और हर व्यक्ति अपनी एक सुरक्षित परिधि में ही सिमटने लगता है. यहाँ से एक ख़ास तरह का यथास्थितिवाद हमारे भीतर पनपने लगता है. अगर परिवर्तन की चाह जगती भी है तो प्रयत्न के स्तर तक आते-आते हम कछुए की तरह अपनी खोल में घुस जाते हैंभगत सिंह पैदा तो हो पर मेरे घर में नहीं, पड़ोसी के घर में. यह यथास्थितिवाद ही अधिनायकवाद में तब्दील होता है. जब खुद कुछ करने की कोशिशें नहीं की जा सकती तो ऐसी अवस्था में हमारी सारी समस्याओं का समाधान निकाल देने वाले किसी सुपरमैन या अवतार का इन्तजार के अलावा और बचता ही क्या है. वर्तमान समय में सम्पूर्ण विश्व में मिथकीय पुरुषों की भाँति नेताओं का जो उभार देखने को मिला वह इसी प्रवृत्ति का परिणाम ही तो है. वर्तुल में भी प्रजाप्रिय का उभार ऐसा ही था. राजा के नगर-भ्रमण से ही अगला दिन मान लिया जाता था. प्रजाप्रिय ही नये पंचांग का सूर्य था. ऐसे पक्षियों के जोड़े वितरित किये गये थे जो राज ने आगमन से पूर्व प्रसन्न होने लगते थे. राज-भ्रमण किसी उत्सव-सा होता था. भगवानीकरण की जिस प्रक्रिया के तहत प्रजाप्रिय के व्यक्तित्त्व के चर्चे बढ़ रहे थे, प्रजाप्रिय भी अपनेसामजिक व्यवहार’ (वर्तमान में कैमरा लाइफ) द्वारा उसका दक्ष अभिनय प्रस्तुत करते थे. एक दृश्य देखिये,“भावुक प्रजा ने प्रजाप्रिय को उनकी इस बार की शोभायात्रा में जयजयकार के साथ घेर लिया. नागरिक उनके रथ के आगे पीछे हाथ जोड़े खड़े हो गये. प्रजाप्रिय रथ से नीचे उतरे और उपस्थित नागरिकों में एक सबसे वृध्द नागरिक का हाथ बड़े प्यार से अपने हाथ में थाम लिया. ख़ुशी के मारे उस वृध्द की रुलाई छूट गयी. नागरिकों ने एक बार फिर प्रजाप्रिय का जय्घोध किया.प्रजाप्रिय न्र प्रजा को शांत रहन एक इशारा किया और उस वृध्द नागरिक का हाथ थामे संबोधित किया – “बाबा! मुझे आपके आंसुओं की नहीं आशीर्वाद की ज़रुरत है. मुझे आशीर्वाद दो कि मैं सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलूँ.” इतना कहकर राजा रथ पर सवार हुए और आगे बढ़ गये.” 
         अधिनायकवाद है तो अतिरेक होगा ही. वर्तुल का मूल अतिरेक ही था. ज्यादा काम करना है तो रात को ही ख़त्म कर दिया गया. सुख है तो इतना बढ़ा दिया जाए कि मनोरंजनप्रियता ही मूल स्वभाव बन जाए. ‘महादंड के अलावा वहाँ कोई दंडविधान नहींथा. राष्ट्रप्रेम की भावना भी अति ही थी, जिसका प्रतिनिधि गुप्तचर-दल प्रमुख सुंग था. भावना का अतिरेक तर्क के क्षरण की शर्त पर ही संभव होता है और ऐसे में बहुत कुछ ऐसा नहीं देख पाते जो अक्सर देखते हैं. अंत में जब सुंग के समक्ष राजा का राज खुलता है तो वह यह कहते हुए आत्महत्या कर लेता है – ‘ओह! ओह अर्तुल! मैं किसके लिए लड़ रहा था’. सुंग की आत्महत्या आस्था और विश्वास की हत्या है और जब-जब विश्वास के होने में विचार का कोई स्थान नहीं होगा, तब-तब उसकी परिणति दुखद ही होगी. विश्वास था तो ऐसा कि राजा के विरुद्ध कुछ सुनते ही राष्ट्रवादी सुंग की मजबूत भुजाएँ फड़कने लगती थीं और टूटा तो ऐसा कि उसकी जान लेकर गया. ‘साइको नैशनलिज्मके साथ एक समस्या यह भी है कि उसमें व्यक्ति राष्ट्र की बजाये अधिनायक का अनुयायी हो जाता है. यही सुंग की दुखद परिणति का कारण बनता है. कहानी में और भी बहुत-से सूत्र हैं जो नेपथ्य की गुत्थियों की नब्ज हैं – “साथ ही साथ नगर के तमाम राज अधिकारियों के वेतन में दोगुनी वृद्धि करने की सहमति भी बनी. नगर के सभी पुरोहितों की आमदनी को करमुक्त कर दिया गया और यज्ञ की सभी सामग्रियों की खरीद को आधा अवमूल्यित कर दिया गया. चीजें जब सस्ती होती हैं तो प्रजा की असहमतियाँ ज्यादा देर टिकती नहीं.” आदि. इस प्रकार के सूत्र प्रतीक-रूप में हैं. यों प्रवीण कुमार इस मामले में चतुर कहानीकार हैं. आलोच्य कहानी से पहले प्रकाशित दो कहानियाँ – ‘नया जफरनामाऔरछबीला रंगबाज का शहर’ – अपनी प्रतीक-व्यवस्था में बेजोड़ हैं और फिर इस कहानी में तो शिल्प-प्रविधि के तौर पर फैंटेसी का प्रयोग किया गया है. प्रतीकात्मकता फैंटेसी का अनिवार्य तत्त्व है. इस कहानी का तो सम्पूर्ण विधान ही प्रतीकात्मक है. राजा-प्रजा और राजशाही व्यवस्था के ढाँचे का प्रयोग अनायास नहीं. शीर्षक भी खुद प्रतीक ही है. सीताफल स्वयं एक प्रतीक है, जिसका प्रतीकार्थ रचनाकार एक स्थान पर रखता है – “एक औषधि विज्ञानी ने अपने निजी शोधपत्र में यह टिप्पणी जरूर लिख दी थी कि जिन जीव-जंतुओं को इसे खिलाया गया था उन पर तत्काल कोई बुरा असर नहीं दिख रहा है, लेकिन इससे कोई दूरगामी परिणाम दिखें जैसे कि सत्य के दिखते हैं, पर क्या, यह शोध का विषय है.” सीताफल सत्य का प्रतीक है. सत्य की तरह ही उसे नष्ट करने के प्रयत्न को खूब किये जाते हैं पर किया जा नहीं पाता. उसी की तरह वह निरंतर फैलता जाता है और प्रजाप्रिय के भय का कारण बनता रहता है तभी तोएक राजा था जो सीताफल से डरता था’. सीताफल (सत्य) जो मूलतः है तो सत्ता के डर का सबब किन्तु प्रजा को भ्रमित कर दिया जात है – “यह विरोधी राष्ट्रों के कूटनीतिक प्रयासों का फल है.” जिस प्रजाप्रिय का मूल भय अपने रहस्य के खुल जाने का था वह इसे प्रजा से ही जोड़ देता है – “इस शाप से निदान लम्बे समय के संगठित संघर्ष से ही संभव है. राष्ट्र को हमेशा से ही एक ईमानदार संघर्ष की जरूरत रहती है.” जन-विरोधी ताकतों का अपने हितों की पूर्ति के लिए सम्पूर्ण जनता में भय का माहौल पैदा करना कोई नई बात नहीं. आजकल भी इस घिनोने हथकंडे का खूब धड़ल्ले से इसका प्रयोग किया जाता है
        पाठक कहानी में अक्सर महसूस करता है कि रचनाकार दो स्तरों को साध रहा है- एक, सभ्यता के विकास की यात्रा के संदर्भ में और दूसरा कहानी में तात्कालिक संदर्भ भी मिलते हैं. पाठक का यह अहसास हवाई भी नहीं. रचनाकार के इस संचरण के दो स्पष्ट कारण हैं- सत्ता के मूल स्वभाव (निरंकुशता, असंतोष, ताकत को खोने का भय आदि) की समानता और अपने समय से सम्बन्ध. कोई भी रचनाकार अपने समय से विमुख होकर नहीं लिखता. उसके लिखने में उसकी समझ और उसके अनुभवों का भारी योग होता है और उसकी निर्मिति में उसके समय और समाज का. इसी से बहुत-सी जगह तो राष्ट्रवादी राजनीति के बहुत सीधे लक्षण मिल जाते हैं. सुंग का पूरा चरित्र तो जो है सो है ही, राजा के भय को पूरे राष्ट्र पर खतरे की तरह प्रस्तुत किया जाता है और प्रजा के समक्ष एक काल्पनिक शत्रु का प्रोपोगैंडा रच दिया जाता है. क्या यह भी आश्चर्यजनक संयोग नहीं कि दक्षिणपंथी राजनीति की तरह वर्तुल में भी सत्ता तथाकथित सांस्कृतिक नजरिये का बहुत प्रयोग करती है- राजा का प्रेत वाला स्वप्न, गुरु की शनि सम्बन्धी व्याख्या, यज्ञ आदि के सामान पर विशेष रियायत, समस्याओं को शाप के रूप में प्रस्तुत करना और उनके समाधान के रूप में नगर की सम्पूर्ण इमारतों पर हल्दी का लेप आदि. और बताइए इस राष्ट्र के संकट की घडी में भी कुछ पढ़े लिखे विरोधी किस्म के नागरिक इन ध्वनियों के अर्थ खोजने में व्यस्त थे
         
     सम्पूर्ण कहानी अप्रत्यक्ष रूप से दो भागों में बँटी हैस्मृति और कल्पना. अब तक स्मृति खंड की चर्चा हुई –  सभ्यताओं के विकास की यात्रा और सत्ता का जनविरोधी रवैया. स्मृति का दामन थामे जैसे कल्पना अपनी जगह खोजती है वैसे ही इस लम्बी कहानी का आखिरी पन्ना कल्पना के हिस्से आया है. कल्पना यानि रचनाकार की आकांक्षा. प्रजा से जनता में तब्दील होते जन-समुदाय का विवेकयुक्त संघर्ष. संघर्ष का जो परिवर्तनकारी रूप जीवन से गायब है उसे रचनाकार ने कहानी में रच दिया है. यह साहित्य का न्याय है.
        
      सुंग की आत्महत्या औरसिंग्ग्गकी ध्वनि का भेद वर्तुल की नीव को हिला देता है. प्रजाप्रिय केसूर्यों की रोशनियाँ मंद पड रही थीं’. उन्हें बुझाने की तैयारी हो चुकी थी. ‘कुलगुरु को इस बात की ज्यादा हैरानी थी कि प्रजा को इस अँधेरे का कोई दर शायद सता नहीं रहा था’ – “वे डरते हैं / किस चीज से डरते हैं वे / तमाम धन-दौलत / गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज के बावजूद / वे डरते हैं / कि एक दिन / निहत्थे और गरीब लोग / उनसे डरना बंद कर देंगे.”(गोरख पाण्डेय). पर उससे भी ज्यादा आश्चर्य की बात थी किउजाले और अँधेरे की निर्णायक लड़ाई में वर्तुल की प्रजा अँधेरे के साथ थी.’ पारम्परिक अर्थ में अगर अँधेरे और उजाले के प्रतीकों को ग्रहण किया जाये तो यहाँ  ‘ऐलिगरीका प्रयोग माना जा सकता है किन्तु मेरे विचार से इसकी आवश्यकता नहीं. यह अनिवार्य नहीं है कि उजाले का सकारात्मक और अँधेरे का नकारात्मक अर्थ ही लिया जाए. रूढ़ हो चुके प्रतीकों को नये अर्थ प्रदान करना भी तो रचनाकार का ही दायित्व है और फिर प्रतीक का अर्थ पाठ से परे जाकर ग्रहण नहीं किया जा सकता. पाठ के भीतर से ही अर्थ लेना होगा. कहानी में उजाला प्रजाप्रिय की दृष्टि की धुरी है. उसकी योजनाओं, शासकीय दृष्टि और सत्ता का प्रतीक. प्रजाप्रिय के पूरे चरित्र को उजाले से अलग करके नहीं समझा जा सकता. प्राकृतिक उजाला यानी दिन; मनुष्य के क्रियाकलाप का समय पर प्रजाप्रिय को सब अतिरिक्त चाहिए और अतिरिक्त माँग अतिरिक्त पूर्ति से ही संभव है. इसी से प्रकृति द्वारा दिए गये समय से काम नहीं चल सकता. और समय चाहिए होगा. इसी से रात को भी दिन में तब्दील करना होगा जिसके लिए बहुत-से कृत्रिम सूर्य आकाश में स्थापित किये जाते हैं. इस तरह अँधेरे को उजाले और रात को भी दिन में बदलना सत्ता के कुछ भी कर सकने के घमंड और उसकी व्यक्तिगत हवस का प्रतीक है और अँधेरे के लिए किया गया संघर्ष प्रजा का सत्ता की मनमानी के प्रतिकार और प्रकृति से संचालित जीवन का समर्थन है. इस लिए अँधेरे और उजाले की निर्णायक लड़ाई में प्रजा का अँधेरे के साथ होना प्रजाप्रिय को भीतर से तोड़ देता है और फिर अंतिम दृश्य है – “प्रजाप्रिय ने बेहद मजबूती से अपना दाहिना पैर परकोटे की गज भर दीवार पर रख दिया और वर्तुल को अंतिम बार झाँकते हुए अपना राजमुकुट हवा में उछाल दिया.”
        कहानी का एक ऐसा पक्ष है जो इस कहानी को अलग बनाता है. पूरी कहानी में वर्तुल का प्रजाप्रिय और उसकी प्रिय प्रजा की खुशहाली वर्णित हुई और जहाँ कहीं समस्या का जिक्र जाया भी तो वहां वर्तुल के अथक संघर्ष ने उसे टिकने नहीं दिया. इतने समृद्ध और आदर्श नगर की दास्तान पढ़ते हुए भी एक भय पाठक के भीतर बढ़ता जाता है. जहाँ संतोष होना चाहिए वहाँ एक अजीब-सी असंतुष्टि पाठक में ही नहीं कहानी के प्रजाप्रिय में भी दिखाई देती है. खैर प्रजाप्रिय का कारण तो पाठ के अंत तक उसके रहस्य के सूत्रों में मिल जाता है पर पाठक का क्या? यहाँ तो अंत भी इतना आदर्शनुमा हो जाता है फिर भला क्या समस्या उसे परेशान करती है. इसका जवाब नामवर सिंह के इस कथन में मिलता है -  “रेडियो और अखबार से असाधारण घटनाएँ सुनते-सुनते हम इतने अभ्यस्त हो गये हैं कि अब कुछ भी असाधारण नहीं लगता. आश्चर्य की बात तो यही है कि अब किसी बात पर आश्चर्य नहीं होता....(इसीलिए) यदि तमाम लोगों और चीजों को उनके नाम तथा लेविल अलग करके एक अनजान, अपरिचित आगन्तुक की तरह देखें तो सब कुछ अजीबों-गरीब लगेगा. हो सकता है किवास्तविकताका पता इसी तरह चले. ...बचपन की जिज्ञासा, कुतूहल, विस्मित होने की क्षमता को प्रौढ़ रूप में इस्तेमाल करें तो साधारण जीवन के बीच से असाधारण जीवन-सत्य का उद्घाटन किया जा सकता है.”(2) कहानी का वर्तुल असल में कोई काल्पनिक लोक नहीं बल्कि हमारी ही दुनिया काअलग लेवल लगासंस्करण ही तो है और उसकी यही बात पाठक को बेचैन करती है. कहानी में रचनाकार समृद्धि के तमाम वर्णन के बावजूद गड़बड़ी के अनुमान की आशंका को बनाये रखता है. यह उसकी रचनाधर्मिता की ताकत है कि जैसे-जैसे पाठक कहानी को पढने की प्रक्रिया में उसके प्रयुक्तअसाधारणके माध्यम से अपनेसाधारणदुनिया के यथार्थ से सामना करता जाता है वैसे-वैसे उसमें भीतर ही भीतर यह खौफ पैदा होने लगता है. यह फैंटेसी की काल्त्म्क-प्रयुक्ति के बिना शायद ही संभव था. यह भी विचारणीय है कि अन्य फैंटेसी रचनाओं की तरह अमूमन यथार्थ को लेकर तो चलती हैं किन्तु आशाजन्य अंत की ओर बढती हैं और अपने काल्पनिक अंत के बावजूद अपनी रचनात्मक विश्वनीयता का क्षरण नहीं होने देती. अलबत्ता इसमें शक नहीं कि यथार्थ के कलात्मक संयोजन के अभाव में फैंटेसी की युक्ति भी रचना को ढहने से नहीं बचा